Tuesday, 2 September 2025

भक्त और भगवान का संबंध

एक बार की बात है -

एक संत जग्गनाथ पूरी से मथुरा की ओर 

आ रहे थे, उनके पास बड़े सुंदर ठाकुर जी थे । 

वे संत उन ठाकुर जी को हमेशा 

साथ ही लिए रहते थे और बड़े प्रेम से उनकी पूजा अर्चना कर लाड़ लड़ाया करते थे ।


ट्रेन से यात्रा करते समय बाबा ने ठाकुर जी को अपनें बगल की सीट पर रख दिया और 

अन्य संतो के साथ हरी चर्चा में मग्न हो गए ।


जब ट्रेन रुकी और सब संत उतरे 

तब वे सत्संग में इतनें मग्न हो चुके थे कि 

झोला गाड़ी में ही रह गया !

उसमें रखे ठाकुर जी भी वहीं गाड़ी में रह गए । संत सत्संग की मस्ती में भावनाओं में 

ऐसा बहे कि ठाकुर जी को साथ लेकर 

आना ही भूल गए ।


बहुत देर बाद जब उस संत के आश्रम पर 

सब संत पहुंचे और भोजन प्रसाद पाने का 

समय आया तो उन प्रेमी संत ने अपने ठाकुर जी को खोजा और देखा कि- 

हमारे ठाकुर जी तो हैं ही नहीं ।


संत बहुत व्याकुल हो गए, 

बहुत रोने लगे परंतु ठाकुर जी मिले नहीं । 

उन्होंने ठाकुर जी के वियोग में अन्न जल लेना स्वीकार नहीं किया । 

संत बहुत व्याकुल होकर विरह में 

अपने ठाकुर जी को पुकारकर रोने लगे ।


तब उनके एक पहचान के संत ने कहा - महाराज मै आपको बहुत सुंदर चिन्हों से 

अंकित नये ठाकुर जी दे देता हूँ ,

परंतु उन संत ने कहा कि हमें अपने 

वही ठाकुर चाहिए जिनको हम अब तक 

लाड़ लड़ाते आये हैं।


तभी एक दूसरे संत ने पूछा - 

आपने उन्हें कहा रखा था ? 

मुझे तो लगता है गाड़ी में ही छूट गए होंगे।


एक संत बोले - अब कई घंटे बीत गए है । 

गाड़ी से किसी ने निकाल लिए होंगे और 

फिर गाड़ी भी बहुत आगे निकल चुकी होगी ।


इस पर वह संत बोले - 

मैं स्टेशन मास्टर से बात करना चाहता हूँ 

वहाँ जाकर । 

सब संत उन महात्मा को लेकर स्टेशन पहुंचे । स्टेशन मास्टर से मिले और ठाकुर जी के 

गुम होने की शिकायत करने लगे । 

उन्होंने पूछा कि कौन-सी गाड़ी में 

आप बैठ कर आये थे ।


संतो ने गाड़ी का नाम स्टेशन मास्टर को 

बताया तो वह कहने लगा - महाराज ! 

कई घंटे हो गए, 

यही वाली गाड़ी ही तो यहां खड़ी हो गई है, 

और किसी प्रकार भी आगे नहीं बढ़ रही है । 

न कोई खराबी है न अन्य कोई दिक्कत, 

कई सारे इंजीनियर सब कुछ चेक कर चुके हैं, परंतु कोई खराबी दिखती है नहीं । 

महात्मा जी बोले - अभी आगे बढ़ेगी, 

मेरे बिना मेरे प्यारे कही अन्यत्र 

कैसे चले जायेंगे ?


वे महात्मा अंदर ट्रेन के डिब्बे के अंदर गए 

और ठाकुर जी वहीं रखे हुए थे 

जहां महात्मा ने उन्हें पधराया था । 

अपने ठाकुर जी को महात्मा ने गले लगाया और जैसे ही महात्मा जी उतरे-

गाड़ी आगे बढ़ने लग गयी । 

ट्रेन का चालक, 

स्टेशन मास्टर तथा सभी इंजीनियर 

सभी आश्चर्य में पड़ गए और बाद में 

उन्होंने जब यह पूरी लीला सुनी तो 

वे गद्गद् हो गए । 

उसके बाद वे सभी जो वहां उपस्थित 

उन सभी ने अपना जीवन संत और 

भगवन्त की सेवा में लगा दिया...


भगवान जी भी खुद कहते है ना....


भक्त जहाँ मम पग धरे, तहाँ धरूँ में हाथ !

सदा संग लाग्यो फिरूँ, कबहू न छोडू साथ !!


मत तोला कर इबादत को अपने हिसाब से,  

ठाकुर जी की कृपा देखकर 

अक्सर तराज़ू टूट जाते हैं !!

कभी गलत नही होते पिता

मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ चाट के ठेले पर दहीबड़े खा रहा था। अचानक ठेले वाले ने अपने बीस-बाईस साल के बेटे को खींचकर थप्पड़ मारा और झुँझलाते हुए बोला, "तुझे कितनी बार समझाया है कि कांजी के पानी वाला कुरछा दहीबड़ों में मत डाला कर। इसका अलग कुरछा रखा है न।"


पिता का यह व्यवहार देखकर मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने कहा, "भाई साहब, यह सही बात नहीं है। यहाँ भरी सड़क पर जवान बेटे को थप्पड़ मारना मूर्खता है।" मेरी बात सुनकर ठेलेवाले की आँखों में आँसू आ गए। वह भरे गले से बोला, "क्या करूँ साहब, जब यह बार-बार गलती करता है तब मुझसे रहा नहीं जाता। एम.ए. कर रहा है फिर भी चूक करता है। शायद अब मैं भी ज़रा चिड़चिड़ा हो गया हूँ।"


पिता के आँसू देख लड़का मेरी ओर मुड़ा और गुस्से में बोला, "गलत मेरे पापा नहीं हैं साहब, गलत आप हैं जो एक बेटे के सामने बाप को गलत सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं। यह मेरे पिता हैं। इनका मुझ पर पूरा हक है। ये चाहे मुझे थप्पड़ मारें या डाँटें, मुझे कोई शिकायत नहीं। जब मुझे शिकायत नहीं है तो आप क्यों टोक रहे हैं। और सुन लीजिए, बाप कभी गलत नहीं होता, हमेशा औलाद ही गलत होती है।" इतना कहकर उसने अपने पिता के आँसू पोंछे और बोला, "पापा, खुद को दुखी मत कीजिए। जब आप मुझे थप्पड़ मारते हैं तब मुझे अच्छा लगता है। बुरा तो तब लगता है जब आप कई दिनों तक मुझ पर हाथ नहीं उठाते। तब मुझे लगता है कि शायद अब आपको मेरी फिक्र ही नहीं रही।"

पत्नी और बच्चे मुझे अजीब नज़रों से देख रहे थे। जैसे मेरी पत्नी आँखों ही आँखों से कह रही हो, "अब समझ आया, दूसरों के पचड़े में पड़ने का नतीजा।" मैंने तुरंत पैसे चुकाए और परिवार को लेकर वहाँ से चल पड़ा। थोड़ी ही दूर जाकर बच्चे फिर पानीपुरी खाने लग गए, लेकिन मेरा मन कहीं और उलझा हुआ था। उस लड़के के शब्द मेरे भीतर नगाड़ों की तरह गूँज रहे थे और बरसों से बंद पड़े एक दरवाज़े को खोल रहे थे।

मुझे अपने पापा याद आ रहे थे। दस साल हो गए थे उनसे मिले हुए। वजह बस इतनी-सी थी कि एक दिन पापा ने मेरी पत्नी के सामने मुझे डाँट दिया था। मैं नाराज़ होकर बोला, "अब मैं बड़ा हो गया हूँ, अब आपकी यह डाँट अच्छी नहीं लगती।" यह सुनकर पापा गुस्से में अपनी जूती निकाल लाए और चिल्लाते हुए बोले, "मुझसे बड़ा हो गया है क्या? बता दूँ तुझे अभी।" वह जूती मेरे कान के पास से निकल गई। मैं बच गया था लेकिन भीतर आग भर गई थी। उसी रात मैंने ठान लिया कि अब इस घर में नहीं रहूँगा।

सुबह चार बजे पत्नी को लेकर मैं चुपके से घर छोड़ आया। माँ, पापा, भाई और भाभी सब पीछे रह गए। सब पापा से डरते थे, मगर मैं बोल जाता था। मुझे लगता था कि पापा गलत हैं। पर आज उस लड़के के शब्द गूँज रहे थे कि "बाप कभी गलत नहीं होता, हमेशा औलाद ही गलत होती है।" और मेरे भीतर सवाल उठ रहा था कि क्या सचमुच गलती मेरी ही थी...?

उस रात नींद नहीं आई। पत्नी ने देखा तो बोली, "लगता है ठेले वाले लड़के की बात दिल को लग गई है।" मैं उदास होकर बोला, "हाँ, सच है। पापा कभी गलत नहीं होते, उनकी हर बात में हमारा भला छुपा होता है।" पत्नी ने प्यार से समझाया, "फिर चिंता क्यों? इस बार दीपावली पर गाँव चलते हैं। पापा जी से मिलना होगा। देखना, वे आपको तुरंत माफ कर देंगे। अगर गुस्से में फिर एक आध जूता भी मार दें तो सह लेना, जैसे बचपन में सहा करते थे।"

सुबह जब हम गाँव पहुँचे तो माँ, भाई, भाभी और भतीजों के चेहरे खिल उठे। दस साल बाद मैंने घर की देहरी लाँघी थी। बैठक में पापा कम्बल ओढ़े सोए हुए थे। मैंने चुपचाप उनके चरण छुए। वे जागे, चश्मा लगाया और मुझे देखा। चेहरे पर वर्षों की नाराजगी थी। फिर बिना कुछ कहे कम्बल से चेहरा ढक लिया। मेरे पाँव वहीं जम गए। बोलने की हिम्मत नहीं थी।


मैंने बेटे बिट्टू को पास बुलाया। वह दादाजी से बहुत स्नेह करता था। उसने जाकर पापा का कम्बल खींचा और बोला, "दादू, देखो पापा आपसे बात करना चाहते हैं।" पापा ने पलटकर कहा, "अपने बाप से कह दो यहाँ से चला जाए। मुझे इससे कोई बात नहीं करनी।" मेरी आँखों में आँसू आ गए। मैं पापा के चरण पकड़कर चुपचाप रो पड़ा। बिट्टू बोला, "दादू, पापा रो रहे हैं।" मैं सिसकते हुए बोला, "माफ कर दो पापा। बहुत देर बाद समझ आया कि आप सही थे, गलती मेरी थी।"


पापा शायद इन्हीं शब्दों का इंतज़ार कर रहे थे। झटके से बैठकर बोले, "आ बेटा, बहुत दिन हो गए तुझे सीने से लगाए हुए। मन करता था कि सारी नाराजगी छोड़कर तेरे पास आ जाऊँ, मगर तू भी तो पत्थर बना हुआ था।" और फिर हम गले मिले। बरसों का बिछोह मिट गया। लगा जैसे जड़ों से कटे पेड़ को फिर से अपनी मिट्टी मिल गई हो, जैसे बरगद की छाँव में लौट आया हूँ।


उस साल की दिवाली सबसे यादगार थी। दस साल का वनवास खत्म हो गया था। पापा और माँ को मैं अपने साथ शहर ले आया। कुछ ही महीनों में पापा का स्वास्थ्य सँभल गया। चेहरे पर पहले जैसी ताजगी लौट आई।


सच है, माता-पिता ईश्वर स्वरूप होते हैं। उनके बिना जीवन अधूरा है।