Wednesday, 23 March 2016

होली गीत

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की,
और डफ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की,
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की,
खुम, शीशे जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की,
महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की।

हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे,
कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग भरे,
दिल फूले देख बहारों को, और कानों में अहंग भरे,
कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे,
कुछ घुंगरू ताल छनकते हों, तब देख बहारें होली की।

गुलजार खिले हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो, 
कपड़ों पे रंग के छिंटों से खुशरंग अजब गुलकारी हो,
मुँह लाल गुलाबी आँखें हों और हाथों में पिचकारी हो,
इस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो,
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।

Friday, 4 March 2016

ये जीवन है


परसों मेट्रो स्टेशन से निकलकर ऑफिस जाने के लिए रिक्शा दूंढ रही थी।बाहर बहुत भीड़ थी, रिक्शे वालों और ऑटो वालों में होड़ लगी थी सवारियां बिठाने की। ऐसे मौकों पर अक्सर उनकी आपस में छोटी मोटी लड़ाईयां भी हो जाती हैं। पर परसों कुछ ऐसा देखा और महसूस किया जिसने मुझे हिला कर रख दिया।
ज्यादा भीड़ की वजह से कोई भी 30 रु से कम में जाने के लिए राज़ी नहीं हो रहा था जबकि वाज़िब रु 20 होते हैं। अभी सोच ही रही थी कि एक रिक्शे वाला पीछे से आगे आकर बोला कि वो 20रु में चलेगा। मैं अभी रिक्शे पर बैठी ही थी कि एक आदमी, जो शायद रिक्शा स्टैंड का ठेकेदार रहा होगा, वहां आया और उस रिक्शे वाले को बुरी तरह पीटना शुरू कर दिया।कसूर सिर्फ इतना था कि उसने लाइन तोड़ कर सवारी बिठा ली थी।बेतहाशा मार खाने के बाद वो रिक्शे वाला कुछ पल के लिए रुका और फिर ऐसे रिक्शा चलाने लगा जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
इस पूरे दौरान मैं रिक्शे पर ही बैठी थी।मार उसको पड़ी थी और तकलीफ मुझे हो रही थी।मेरा खुद पर से नियंत्रण समाप्त हो गया, मैं रास्ते भर रोती रही। वो हैंडल के पास लगे शीशे से मुझे देख रहा था और शायद सोच भी रहा होगा कि कैसी पागल लड़की है!
पैसे देते समय वो गौर से मेरा चेहरा देख रहा था शायद पक्का करना चाह रहा था कि मैं रो चुकी हूँ।
पैसों का महत्त्व मुझे पता है,फिजूलखर्च से मैं बचती हूँ।फिर भी कभी-कभी 50-100 रु हम ऐसे ही उन चीज़ों पर खर्च कर देते हैं जो शायद इतने ज़रूरी ना हों।
ऐसा नहीं होगा उस रिक्शेवाले ने उस दिन पहली बार लाइन तोड़ी होगी और मार खाई होगी।शायद वो इसका आदी होगा पर मुझे वो 20 रु ज़िन्दगी भर याद रहेंगे। वो 20 रु शायद उसके घर की सब्जी रहे होंगे या उसका एक समय का खाना होंगे। 20 रु में किसी गरीब के यहाँ बहुत कुछ आ सकता जो शायद हम और आप सोच नहीं सकते।


साभार फ़ेसबुक