Sunday, 28 August 2016

आत्मवेत्ता संत

(((( आत्मवेत्ता संत ))))
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दो संन्यासी युवक यात्रा करते-करते किसी गाँव में पहुँचे।
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लोगों से पूछा हमें एक रात्रि यहाँ रहना है किसी पवित्र परिवार का घर दिखाओ
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लोगों ने बताया कि वहा एक चाचा का घर है। साधु-महात्माओं का आदर सत्कार करते हैं।
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अखिल ब्रह्माण्डमां एक तुं श्रीहरि' का पाठ उनका पक्का हो गया है। वहाँ आपको ठीक रहेगा।
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उन्होंने उन सज्जन चाचा का पता बताया। दोनों संन्यासी वहाँ गये।
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चाचा ने प्रेम से सत्कार किया, भोजन कराया और रात्रि-विश्राम के लिए बिछौना दिया।
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रात्रि को कथा-वार्ता के दौरान एक संन्यासी ने प्रश्न कियाः की आपने कितने तीर्थों में स्नान किया है ?
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कितनी तीर्थयात्राएँ की हैं। ?
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हमने तो चारों धाम की तीन-तीन बार यात्रा की है।
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चाचा ने कहा.. मैंने एक भी तीर्थ का दर्शन या स्नान नहीं किया है।
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यहीं रहकर भगवान का भजन करता हूँ और आप जैसे भगवत्स्वरूप अतिथि पधारते हैं तो सेवा करने का मौका पा लेता हूँ।
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अभी तक कहीं भी नहीं गया हूँ।
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दोनों संन्यासी आपस में विचार करने लगेः ऐसे व्यक्ति का अन्न खाया !
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अब यहाँ से चले जायें तो रात्रि कहाँ बितायेंगे ? यकायक चले जायें तो उसको दुःख भी होगा। चलो, कैसे भी करके इस विचित्र वृद्ध के यहाँ रात्रि बिता दें।
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जिसने एक भी तीर्थ नहीं किया उसका अन्न खा लिया, हाय ! आदि-आदि।
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इस प्रकार विचारते हुए वे सोने लगे लेकिन नींद कैसे आवे !
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करवटें बदलते-बदलते मध्यरात्रि हुई।
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इतने में द्वार से बाहर देखा तो गौ के गोबर से लीपे हुए बरामदे में एक काली गाय आयी.... फिर दूसरी आयी.... तीसरी, चौथी.... पाँचवीं... ऐसा करते-करते कई गायें आयीं।
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हरेक गाय वहाँ आती, बरामदे में लोटपोट होती और सफेद हो जाती तब अदृश्य हो जाती।
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ऐसी कितनी ही काली गायें आयीं और सफेद होकर विदा हो गयीं।
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दोनों संन्यासी फटी आँखों से देखते ही रह गये। वे दंग रह गये कि यह क्या कौतुक हो रहा है !
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आखिरी गाय जाने की तैयारी में थी तो उन्होंने उसे प्रणाम करके पूछाः
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हे गौ माता ! आप कौन हो और यहाँ कैसे आना हुआ ?
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यहाँ आकर आप श्वेतवर्ण हो जाती हो इसमें क्या रहस्य है ? कृपा करके आपका परिचय दें।
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गाय बोलने लगीः हम गायों के रूप में सब तीर्थ हैं। लोग हममें गंगे हर... यमुने हर.... नर्मदे हर... आदि बोलकर गोता लगाते हैं।
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हममें अपने पाप धोकर पुण्यात्मा होकर जाते हैं और हम उनके पापों की कालिमा मिटाने के लिए द्वन्द्व-मोह से विनिर्मुक्त आत्मज्ञानी, आत्मा-परमात्मा में विश्रान्ति पाये हुए सत्पुरूषों के आँगन में आकर पवित्र हो जाते हैं।
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हमारा काला बदन पुनः श्वेत हो जाता है।
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तुम लोग जिनको अशिक्षित, गँवार, बूढ़ा समझते हो वे बुजुर्ग के जहाँ से तमाम विद्याएँ निकलती हैं.... उस आत्मदेव में विश्रान्ति पाये हुए आत्मवेत्ता संत हैं।
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तीर्थी कुर्वन्ति जगतीं....
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ऐसे आत्मारामी ब्रह्मवेत्ता महापुरुष जगत को तीर्थरूप बना देते हैं।
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अपनी दृष्टि से, संकल्प से, संग से जन-साधारण को उन्नत कर देते हैं।
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ऐसे पुरुष जहाँ ठहरते हैं, उस जगह को भी तीर्थ बना देते हैं।

Thursday, 18 August 2016

बहन

एक बहन ने अपने भाई को एक मार्मिक संदेश भेजा है जिसे मै यहां शेयर कर रहा हूं...ये कहानी या लेखन की उपज नही है वरन यथार्थ है........
..निर्विववाद रूप से "लड़की" के लिए दुनिया का सबसे बुरा संबोधन क्या होता है ????? "मोटी"...लेकिन लेकिन.. शायद ही कोई हिंदुस्तानी लड़की हो जो अपने भाई द्वारा इस नाम से न पुकारी गयी हो । लड़की चाहे लाख कुपोषित हो , डॉक्टर्स अंडर वेट कह वज़न बढ़ाने की दवा दे फिर भी भाई "मोटी" कहने से बाज़ नही आएगा । कभी लाड़ में तो कभी लड़ाई झगड़े में "मोटी" । दूसरा लक्षण एक हिंदुस्तानी भाई का यह है कि उनके खिंचने से शायद ही किसी बहन की चोटी बची हो ।लड़ाई झगड़े में ये चोटी सबसे कमजोर कड़ी साबित होती है ।
बचपन की इस सारी नोक झोंक में हमेशा भाई ही डॉन होता है आखिर भाई.. "भाई".. है हाहाहा। फिर भी उसे शिकायत होती है बहन से,... बहुत इतराती है , ..नखरे दिखाती है , ...सबके आगे सीधी बनती है , लगी वगी कुछ नही झूठ का रोती है । भाई छोटा हो या बड़ा होश सम्हालते ही बहन को नियंत्रित करना सीख जाता है । हालांकि कई बार ये टोका टाकी खीज पैदा करती है लेकिन कही न कही इसमें बहन के प्रति फ़िक्र होती है । लड़कियां कितना भी लड़े झगडे लेकिन उन्हें अपना औसत दर्जे का भाई भी "हीरो" लगता है । नोक झोंक भरे "टॉम और जेरी" के चूहे बिल्ली वाले रिश्ते का गाढ़ापन तो बहन की विदाई के बाद ही पता चलता है । लड़के अक्सर अपने गाम्भीर्य में प्यार के इस नाज़ुक अहसास को कठोरता के आवरण में छिपाये फिरते है । कभी वक़्त के साथ , कभी भगौलिक दूरियों की वज़ह से कभी किसी भावनात्मक चोट से या कभी किसी एक के अहम् के आड़े आने पर कई बार इस खूबसूरत रिश्ते में दरार आ जाती है या बंधन शिथिल पड़ने लगते है । कई दफा माता पिता की चिंता या भाभी से तालमेल के अभाव में अनचाहे ही इन रिश्तों में दूरियाँ आ जाती है । फिर भी यकीन मानिए बाज़ार में लटकती "राखियां" देख हर बहन के आगे मुस्काता सा बचपन के उस झगड़ालू भाई का चेहरा बन जाता है ,जिस पर बेशुमार प्यार आता है । रक्षा बंधन वो दिन होता है जिसके एक सप्ताह पहले से काउंट डाउन शुरू हो जाता है । जाने क्या है ये रिश्ता भाई गर बहन से बड़ा हो तो "पिता" बन जाता है और बहन अगर भाई से बड़ी हो तो "माँ" बन जाती है । मुसीबत या दुःख के वक़्त जेहन में सबसे पहले आने वाला यह सबसे भरोसे का रिश्ता होता है । इस विश्वास की आँच में सारी मुसीबते ,गम पिघल जाते है और मन हल्का हो जाता है । किसी भी , किसी भी वज़ह से इस प्रगाढ़ रिश्ते में अगर नाराजगी हो तब भी किसी के खामोश इंतज़ार को जाया मत होने दीजिए ।बात जब अपनों की हो तो झुकना फायदे का सौदा होता है ।
........"मुसीबत गयी कह "विदाई" में हँस के गले लगाया था ,
.......वो सबसे छुप के रोया बहुत ,सुर्ख आँखों ने बताया था "
भाई बहन के प्यार के प्रतीक इस पावन पर्व की सभी को शुभकामनाएं ।।।

बहू में भी एक बेटी का दिल है।

अरे उठो अरे उठो .....सुबह सुबह रक्षा के जोरदार चिलाने की आवाज सुनकर नींद से उठा वह कह रही थी पता है आज रक्षा बंधन का त्यौहार है और बूआजी व दीदी ना जाने किसी भी समय आ सकती है, और तुम सो रहे हो।अभी तो तुमको वृद्धाश्रम भी जाना है और वहा से बाबूजी को लेकर आना है,पत्नी की आवाज सुनकर जल्दी से उठ गया और कुछ ही देर में तैयार होकर वृद्धाश्रम की और चल पड़ा।रास्ते में न जाने कई ख्याल बादलों की तरह आ रहे और जा रहे थे बाबूजी कैसे होंगे उनका स्वास्थ्य कैसा होगा क्योकि उनसे मिले कई महीनें हो गए थे इसी उठा पटक में वृद्धाश्रम पहुच गया, वहा बाबूजी से मिला उनको प्रणाम किया और अपने साथ लेकर घर की और चल पड़ा रास्ते में बाबूजी से स्वास्थ्य के बारे में चर्चा कर रहा था बाबूजी बोले बेटा मै तो बहुत प्रसन्न हूँ और स्वास्थ भी अच्छा ही है, अब कितने दिन जीना है, पाँव कब्र में लटके हुए है ना जाने मौत कब आ जाएगी। ऐसे बातें करते हुए घर पहुच गए।घर पर बूआजी व दीदी भी आ गई थी, बाबूजी भी उनसे मिलकर बहुत प्रसन्न दिख रहे थे।हम सब ने मिलकर हंसी ख़ुशी से रक्षा बंधन का त्यौहार मनाया।समय अपनी गति से दौड़ा जा रहा था शाम होते होते बूआजी व दीदी अपने घर जाने लगे, उनको रोकना चाहा पर वो रुके नहीं उनके घर पर सास ससुर की सेवा करने वाला कोई नहीं था इसलिए वह समय पर अपने घर चले गए।मै रक्षा और बाबूजी रहे गए तभी रक्षा की आवाज आई बाबूजी को वृद्धाश्रम छोड़ने नहीं जाना है क्या???? बीबी की आवाज सुनकर नहीं चाहते हुए भी थके हुए कदमों की तरह कदम बढ़ाता हुआ बड़ी मुश्किल से चल पड़ा बाबूजी को वृद्धाश्रम छोड़ने का मेरा मन नहीं था पर क्या करता रक्षा की रोज रोज की चिकचिक से परेशान था।बाबूजी को लेकर वृद्धाश्रम पहुचा उनको वहा छोड़कर वापस चलने लगा आँखों में से आसु आ गए उनको छोड़ना नहीं चाहता था पर क्या करता मै मजबूर था??? जैसे ही रवाना हुआ पीछे से बाबूजी की आवाज आई बेटा तू रो मत अपने मन पर कोई बोझ मत रखना यह तो मेरा नसीब है तुझे पाने के लिए तेरी दीदी के बाद 3 कन्या भ्रूण की हत्या करवाई थी, उनके बाद तू अपनी माँ के कोख में आया था, उस समय मुझे पता नहीं था मै दुनियादारी के झुटे झांसे में आ गया और बेटे की चाहत में पागल हो गया था उसी पागलपन के कारण भ्रूण हत्या जैसा पाप कर बैठा जिसकी सजा भगवान मुझे दे रहे है, ऐसे कहते हुए बाबूजी की आँखें नम हो गए.......उन्होंने अपने आपको सम्भाला और मुझसे कहने लगे बेटा तेरे से एक विनती है मैंने जो गलती की है वो जीवन में तू कभी मत करना, बेटे के लिए कन्या भ्रूण की हत्या मत करवाना नहीं तो तुझे भी अपना बुढ़ापा वृद्धाश्रम में बिताना पडेगा......उनकी आवाज में एक दर्द छुपा हुआ था, उनसे विदा लेकर मै चल पड़ा, पुरे रास्ते उनकी आवाज मेरे कानों में गुज रही थी, घर आकर रक्षा को बाबूजी की बात सुनाई उसकी आँखों में भी आसूँ आने लग गए, थोड़ी देर हम दोनों चुपचाप बैठे रहे.....तभी रक्षा ने आदेश दिया गाडी निकालो हम अभी के अभी वृद्धाश्रम जाएंगे और वहा से बाबूजी को लेकर आएँगे, मेरे पैरो में मानो जैसे पंख लग गए, गाडी निकाल कर हम दोनों बाबूजी को लेने वृद्धाश्रम की और चल पड़े।
सज्जनों मेरा आपसे सादर निवेदन है बेटी आखिर बेटी ही होती है रक्षा भी किसी की बेटी थी बहु बनकर दूसरे के घर चली गई पर मन तो उसका कोमल ही था जिस कारण मन तो परिवर्तन होना ही था और हम बेटा बेटी के चक्कर में पड़कर जाने अनजाने में पाप कर बैठते है जिसका फल हमको भोगना ही पड़ता है।इसलिए आइये रक्षा बंधन के पवित्र त्यौहार पर रक्षा जैसी बेटी पर गर्व करते हुए संकल्प करें और "आठवाँ वचन" लेवें कि भ्रूण हत्या व बेटियों पर अत्याचार नहीं होने देंगे तभी हमारा रक्षा बंधन त्यौहार मनाना सार्थक होगा और यही सही मायनों में अपनी बहनों को दिया हुआ अनमोल उपहार होगा।

Wednesday, 17 August 2016

जीवन का एक रहस्य .....


एक औरत बहुत महँगे कपड़े में अपने मनोचिकित्सक के पास जाती है और उसे कहती है कि उसे लगता है कि उसका पूरा जीवन बेकार है, उसका कोई अर्थ नहीं है। वे उसकी खुशियाँ ढूँढने में मदद करें।
मनोचिकित्सक ने एक बूढ़ी औरत को बुलाया जो वहाँ साफ़-सफाई का काम करती थी और उस अमीर औरत से बोला - "मैं मैरी से तुम्हें यह बताने के लिए कहूँगा कि कैसे उसने अपने जीवन में खुशियाँ ढूँढी। मैं चाहता हूँ कि आप उसे ध्यान से सुनें।"
तब उस बूढ़ी औरत ने अपना झाड़ू नीचे रखा, कुर्सी पर बैठ गई और बताने लगी - "मेरे पति की मलेरिया से मृत्यु हो गई और उसके 3 महीने बाद ही मेरे बेटे की भी सड़क हादसेमें मौत हो गई। मेरे पास कोई नहीं था। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा था। मैं सो नहीं पाती थी, खा नहीं पाती थी, मैंने मुस्कुराना बंद कर दिया था।
मैं खुद का जीवन लेने की तरकीबें सोचने लगी थी। तब एक दिन, एक छोटा बिल्ली का बच्चा मेरे पीछे लग गया जब मैं काम से घर आ रही थी। बाहर बहुत ठंड थी इसलिए मैंने उस बच्चे को अंदर आने दिया। उस बिल्ली के बच्चे के लिए थोड़े से दूध का इंतजाम किया और वह सारी प्लेट सफाचट कर गया। फिर वह मेरे पैरों से लिपट गया और चाटने लगा।
उस दिन बहुत महीनों बाद मैं मुस्कुराई । तब मैंने सोचा अगर इस बिल्ली के बच्चे की सहायता करना मुझे ख़ुशी दे सकता है, तो हो सकता है दूसरों के लिए कुछ करके मुझे और भी ख़ुशी मिले। इसलिए अगले दिन मैं अपने पड़ोसी, जो कि बीमार था, उसके लिए कुछ बिस्किट्स बना कर ले गई।
हर दिन मैं कुछ नया और कुछ ऐसा करती थी जिससे दूसरों को ख़ुशी मिले और उन्हें खुश देख कर मुझे ख़ुशी मिलती थी। आज, मैं किसी को नहीं जानती जो मुझे बेहतर खाता-पीता हो और चैन से सोता हो। मैंने खुशियाँ ढूँढी हैं, दूसरों को ख़ुशी देकर।
यह सब सुन कर वह अमीर औरत रोने लगी। उसके पास वह सब था जो वह पैसे से खरीद सकती थी पर उसने वह चीज खो दी थी जो पैसे से नहीं खरीदी जा सकती। हमारा जीवन इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने खुश हैं अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी वजह से कितने लोग खुश हैं।
......
ख़ुशी मंजिल नहीं, यात्रा है..,वह कल नहीं, आज है..
निर्भरता नहीं, निर्णय है..,यह नहीं कि हम कौन है,
अपितु हमारे पास क्या है।

Tuesday, 9 August 2016

एक अनोखा तलाक


हुआ यों कि पति ने पत्नी को किसी बात पर तीन थप्पड़ जड़ दिए, पत्नी ने इसके जवाब में अपना सैंडिल पति की तरफ़ फेंका, सैंडिल का एक सिरा पति के सिर को छूता हुआ निकल गया। मामला रफा-दफा हो भी जाता, लेकिन पति ने इसे अपनी तौहिनी समझी, रिश्तेदारों ने मामला और पेचीदा बना दिया, न सिर्फ़ पेचीदा बल्कि संगीन, सब रिश्तेदारों ने इसे खानदान की नाक कटना कहा, यह भी कहा कि पति को सैडिल मारने वाली औरत न वफादार होती है न पतिव्रता। इसे घर में रखना, अपने शरीर में मियादी बुखार पालते रहने जैसा है। कुछ रिश्तेदारों ने यह भी पश्चाताप जाहिर किया कि ऐसी औरतों का भ्रूण ही समाप्त कर देना चाहिए।
बुरी बातें चक्रवृत्ति ब्याज की तरह बढ़ती है, सो दोनों तरफ खूब आरोप उछाले गए। ऐसा लगता था जैसे दोनों पक्षों के लोग आरोपों का वॉलीबॉल खेल रहे हैं। लड़के ने लड़की के बारे में और लड़की ने लड़के के बारे में कई असुविधाजनक बातें कही।
मुकदमा दर्ज कराया गया। पति ने पत्नी की चरित्रहीनता का तो पत्नी ने दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया। छह साल तक शादीशुदा जीवन बीताने और एक बच्ची के माता-पिता होने के बाद आज दोनों में तलाक हो गया।
पति-पत्नी के हाथ में तलाक के काग़ज़ों की प्रति थी।
दोनों चुप थे, दोनों शांत, दोनों निर्विकार।
मुकदमा दो साल तक चला था। दो साल से पत्नी अलग रह रही थी और पति अलग,
मुकदमे की सुनवाई पर दोनों को आना होता। दोनों एक दूसरे को देखते जैसे चकमक पत्थर आपस में रगड़ खा गए हों।
दोनों गुस्से में होते। दोनों में बदले की भावना का आवेश होता। दोनों के साथ रिश्तेदार होते जिनकी हमदर्दियों में ज़रा-ज़रा विस्फोटक पदार्थ भी छुपा होता।
लेकिन कुछ महीने पहले जब पति-पत्नी कोर्ट में दाखिल होते तो एक-दूसरे को देख कर मुँह फेर लेते। जैसे जानबूझ कर एक-दूसरे की उपेक्षा कर रहे हों, वकील औऱ रिश्तेदार दोनों के साथ होते।
दोनों को अच्छा-खासा सबक सिखाया जाता कि उन्हें क्या कहना है। दोनों वही कहते। कई बार दोनों के वक्तव्य बदलने लगते। वो फिर सँभल जाते।
अंत में वही हुआ जो सब चाहते थे यानी तलाक ................
पहले रिश्तेदारों की फौज साथ होती थी, आज थोड़े से रिश्तेदार साथ थे। दोनों तरफ के रिश्तेदार खुश थे, वकील खुश थे, माता-पिता भी खुश थे।
तलाकशुदा पत्नी चुप थी और पति खामोश था।
यह महज़ इत्तेफाक ही था कि दोनों पक्षों के रिश्तेदार एक ही टी-स्टॉल पर बैठे , कोल्ड ड्रिंक्स लिया।
यह भी महज़ इत्तेफाक ही था कि तलाकशुदा पति-पत्नी एक ही मेज़ के आमने-सामने जा बैठे।
लकड़ी की बेंच और वो दोनों .......
''कांग्रेच्यूलेशन .... आप जो चाहते थे वही हुआ ....'' स्त्री ने कहा।
''तुम्हें भी बधाई ..... तुमने भी तो तलाक दे कर जीत हासिल की ....'' पुरुष बोला।
''तलाक क्या जीत का प्रतीक होता है????'' स्त्री ने पूछा।
''तुम बताओ?''
पुरुष के पूछने पर स्त्री ने जवाब नहीं दिया, वो चुपचाप बैठी रही, फिर बोली, ''तुमने मुझे चरित्रहीन कहा था....
अच्छा हुआ.... अब तुम्हारा चरित्रहीन स्त्री से पीछा छूटा।''
''वो मेरी गलती थी, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था'' पुरुष बोला।
''मैंने बहुत मानसिक तनाव झेली है'', स्त्री की आवाज़ सपाट थी न दुःख, न गुस्सा।
''जानता हूँ पुरुष इसी हथियार से स्त्री पर वार करता है, जो स्त्री के मन और आत्मा को लहू-लुहान कर देता है... तुम बहुत उज्ज्वल हो। मुझे तुम्हारे बारे में ऐसी गंदी बात नहीं करनी चाहिए थी। मुझे बेहद अफ़सोस है, '' पुरुष ने कहा।
स्त्री चुप रही, उसने एक बार पुरुष को देखा।
कुछ पल चुप रहने के बाद पुरुष ने गहरी साँस ली। कहा, ''तुमने भी तो मुझे दहेज का लोभी कहा था।''
''गलत कहा था''.... पुरुष की ओऱ देखती हुई स्त्री बोली।
कुछ देर चुप रही फिर बोली, ''मैं कोई और आरोप लगाती लेकिन मैं नहीं...''
प्लास्टिक के कप में चाय आ गई।
स्त्री ने चाय उठाई, चाय ज़रा-सी छलकी। गर्म चाय स्त्री के हाथ पर गिरी।
स्सी... की आवाज़ निकली।
पुरुष के गले में उसी क्षण 'ओह' की आवाज़ निकली। स्त्री ने पुरुष को देखा। पुरुष स्त्री को देखे जा रहा था।
''तुम्हारा कमर दर्द कैसा है?''
''ऐसा ही है कभी वोवरॉन तो कभी काम्बीफ्लेम,'' स्त्री ने बात खत्म करनी चाही।
''तुम एक्सरसाइज भी तो नहीं करती।'' पुरुष ने कहा तो स्त्री फीकी हँसी हँस दी।
''तुम्हारे अस्थमा की क्या कंडीशन है... फिर अटैक तो नहीं पड़े????'' स्त्री ने पूछा।
''अस्थमा।डॉक्टर सूरी ने स्ट्रेन... मेंटल स्ट्रेस कम करने को कहा है, '' पुरुष ने जानकारी दी।
स्त्री ने पुरुष को देखा, देखती रही एकटक। जैसे पुरुष के चेहरे पर छपे तनाव को पढ़ रही हो।
''इनहेलर तो लेते रहते हो न?'' स्त्री ने पुरुष के चेहरे से नज़रें हटाईं और पूछा।
''हाँ, लेता रहता हूँ। आज लाना याद नहीं रहा, '' पुरुष ने कहा।
''तभी आज तुम्हारी साँस उखड़ी-उखड़ी-सी है, '' स्त्री ने हमदर्द लहजे में कहा।
''हाँ, कुछ इस वजह से और कुछ...'' पुरुष कहते-कहते रुक गया।
''कुछ... कुछ तनाव के कारण,'' स्त्री ने बात पूरी की।
पुरुष कुछ सोचता रहा, फिर बोला, ''तुम्हें चार लाख रुपए देने हैं और छह हज़ार रुपए महीना भी।''
''हाँ... फिर?'' स्त्री ने पूछा।
''वसुंधरा में फ्लैट है... तुम्हें तो पता है। मैं उसे तुम्हारे नाम कर देता हूँ। चार लाख रुपए फिलहाल मेरे पास नहीं है।'' पुरुष ने अपने मन की बात कही।
''वसुंधरा वाले फ्लैट की कीमत तो बीस लाख रुपए होगी??? मुझे सिर्फ चार लाख रुपए चाहिए....'' स्त्री ने स्पष्ट किया।
''बिटिया बड़ी होगी... सौ खर्च होते हैं....'' पुरुष ने कहा।
''वो तो तुम छह हज़ार रुपए महीना मुझे देते रहोगे,'' स्त्री बोली।
''हाँ, ज़रूर दूँगा।''
''चार लाख अगर तुम्हारे पास नहीं है तो मुझे मत देना,'' स्त्री ने कहा।
उसके स्वर में पुराने संबंधों की गर्द थी।
पुरुष उसका चेहरा देखता रहा....
कितनी सह्रदय और कितनी सुंदर लग रही थी सामने बैठी स्त्री जो कभी उसकी पत्नी हुआ करती थी।
स्त्री पुरुष को देख रही थी और सोच रही थी, ''कितना सरल स्वभाव का है यह पुरुष, जो कभी उसका पति हुआ करता था। कितना प्यार करता था उससे... एक बार हरिद्वार में जब वह गंगा में स्नान कर रही थी तो उसके हाथ से जंजीर छूट गई। फिर पागलों की तरह वह बचाने चला आया था उसे। खुद तैरना नहीं आता था लाट साहब को और मुझे बचाने की कोशिशें करता रहा था... कितना अच्छा है... मैं ही खोट निकालती रही...''
पुरुष एकटक स्त्री को देख रहा था और सोच रहा था, ''कितना ध्यान रखती थी, स्टीम के लिए पानी उबाल कर जग में डाल देती। उसके लिए हमेशा इनहेलर खरीद कर लाती, सेरेटाइड आक्यूहेलर बहुत महँगा था। हर महीने कंजूसी करती, पैसे बचाती, और आक्यूहेलर खरीद लाती। दूसरों की बीमारी की कौन परवाह करता है? ये करती थी परवाह! कभी जाहिर भी नहीं होने देती थी। कितनी संवेदना थी इसमें। मैं अपनी मर्दानगी के नशे में रहा। काश, जो मैं इसके जज़्बे को समझ पाता।''
दोनों चुप थे, बेहद चुप।
दुनिया भर की आवाज़ों से मुक्त हो कर, खामोश।
दोनों भीगी आँखों से एक दूसरे को देखते रहे....
''मुझे एक बात कहनी है, '' उसकी आवाज़ में झिझक थी।
''कहो, '' स्त्री ने सजल आँखों से उसे देखा।
''डरता हूँ,'' पुरुष ने कहा।
''डरो मत। हो सकता है तुम्हारी बात मेरे मन की बात हो,'' स्त्री ने कहा।
''तुम बहुत याद आती रही,'' पुरुष बोला।
''तुम भी,'' स्त्री ने कहा।
''मैं तुम्हें अब भी प्रेम करता हूँ।''
''मैं भी.'' स्त्री ने कहा।
दोनों की आँखें कुछ ज़्यादा ही सजल हो गई थीं।
दोनों की आवाज़ जज़्बाती और चेहरे मासूम।
''क्या हम दोनों जीवन को नया मोड़ नहीं दे सकते?'' पुरुष ने पूछा।
''कौन-सा मोड़?''
''हम फिर से साथ-साथ रहने लगें... एक साथ... पति-पत्नी बन कर... बहुत अच्छे दोस्त बन कर।''
''ये पेपर?'' स्त्री ने पूछा।
''फाड़ देते हैं।'' पुरुष ने कहा औऱ अपने हाथ से तलाक के काग़ज़ात फाड़ दिए। फिर स्त्री ने भी वही किया। दोनों उठ खड़े हुए। एक दूसरे के हाथ में हाथ डाल कर मुस्कराए। दोनों पक्षों के रिश्तेदार हैरान-परेशान थे। दोनों पति-पत्नी हाथ में हाथ डाले घर की तरफ चले गए। घर जो सिर्फ और सिर्फ पति-पत्नी का था ।।
पति पत्नी में प्यार और तकरार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जरा सी बात पर कोई ऐसा फैसला न लें कि आपको जिंदगी भर अफसोस हो ।।

बेटियाँ

"पापा मुझे मेंहदी लगवानी है" पंद्रह साल की चुटकी बाज़ार में बैठी मेंहदी वाली को देखते ही मचल गयी..
"कैसे लगाती हो मेंहदी " विनय नें सवाल किया..
"एक हाथ के पचास दो के सौ" मेंहदी वाली ने जवाब दिया..
विनय को मालूम नहीं था मेंहदी लगवाना इतना मँहगा हो गया है..
"नहीं भई एक हाथ के बीस लो वरना हमें नहीं लगवानी"
यह सुनकर चुटकी नें मुँह फुला लिया..
"अरे अब चलो भी,, नहीं लगवानी इतनी मँहगी मेंहदी" विनय के माथे पर लकीरें उभर आयीं..
"अरे लगवाने दो ना साहब,, अभी आपके घर में है तो आपसे लाड़ भी कर सकती है.. कल को पराये घर चली गयी तो पता नहीं ऐसे मचल पायेगी या नहीं.. तब आप भी तरसोगे बिटिया की फरमाइश पूरी करने को"
मेंहदी वाली के शब्द थे तो चुभने वाले पर उन्हें सुनकर विनय को अपनी बड़ी बेटी की याद आ गयी जिसकी शादी उसने तीन साल पहले एक खाते-पीते पढ़े लिखे परिवार में की थी..
उन्होंने पहले साल से ही उसे छोटी-छोटी बातों पर सताना शुरू कर दिया था..
दो साल तक वह मुट्ठी भरभर के रुपये उनके मुँह में ठूँसता रहा पर उनका पेट बढ़ता ही चला गया..
और अंत में एक दिन सीढियों से गिर कर बेटी की मौत की खबर ही मायके पहुँची..
आज वह छटपटाता है कि उसकी वह बेटी फिर से उसके पास लौट आये और वह चुन चुन कर उसकी सारी अधूरी इच्छाएँ पूरी कर दे..
पर वह अच्छी तरह जानता है कि अब यह असंभव है..
"लगा दूँ बाबूजी?? एक हाथ में ही सही " मेंहदी वाली की आवाज से विनय की तंद्रा टूटी..
"हाँ हाँ लगा दो.. एक हाथ में नहीं,, दोनों हाथों में.. और हाँ!! इससे भी अच्छी वाली हो तो वो लगाना" विनय ने डबडबायी आँखें पोंछते हुए कहा और बिटिया को आगे कर दिया..
जब तक बेटी हमारे घर है,, उनकी हर इच्छा जरूर पूरी करे..
क्या पता आगे कोई इच्छा पूरी हो पाये या ना हो पाये..
ये बेटियां भी कितनी अजीब होती हैं..
जब ससुराल में होती हैं,, तब माइके जाने को तरसती हैं..
सोचती हैं कि घर जाकर माँ को ये बताऊँगी..
पापा से ये मांगूंगी..
बहन से ये कहूँगी..
भाई को सबक सिखाऊंगी..
और मौज मस्ती करुँगी..
लेकिन जब सच में माइके जाती हैं तो
एकदम शांत हो जाती है..
किसी से कुछ भी नहीं बोलती..
बस माँ बाप भाई बहन से गले मिलती है..
बहुत बहुत खुश होती है..
भूल जाती है कुछ पल के लिए पति ससुराल..
क्योंकि..
एक अनोखा प्यार होता है मायके में..
एक अजीब कशिश होती है मायके में..
ससुराल में कितना भी प्यार मिले,, माँ बाप की एक मुस्कान को तरसती है ये बेटियां..
ससुराल में कितना भी रोएँ,, पर माइके में एक भी आंसूं नहीं बहाती ये बेटियां..
क्योंकि..
बेटियों का सिर्फ एक ही आंसू माँ बाप भाई बहन को हिला देता है,, रुला देता है..
कितनी अजीब है ये बेटियां..
कितनी नटखट है ये बेटियां..
खुदा की अनमोल देन हैं ये बेटियां..
हो सके तो बेटियों को बहुत प्यार दें..
उन्हें कभी भी न रुलाये क्योंकि..
ये अनमोल बेटी दो परिवार जोड़ती है,, साथ लाती है अपने प्यार और मुस्कान से..
हम चाहते हैं कि सभी बेटियां खुश रहें हमेशा..
भले ही हो वो मायके में या ससुराल में।।
👦🏼👧🏼