Sunday, 4 March 2018

चरित्रहीन कौन

🔷 संन्यास लेने के बाद गौतम बुद्ध ने अनेक क्षेत्रों की यात्रा की... एक बार वह एक गांव में गए। वहां एक स्त्री उनके पास आई और बोली- आप तो कोई "राजकुमार" लगते हैं। ...क्या मैं जान सकती हूं कि इस युवावस्था में गेरुआ वस्त्र पहनने का क्या कारण है? बुद्ध ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि...

🔶 "तीन प्रश्नों" के हल ढूंढने के लिए उन्होंने संन्यास लिया..

🔷 बुद्ध ने कहा.. हमारा यह शरीर जो युवा व आकर्षक है, पर जल्दी ही यह "वृद्ध" होगा, फिर "बीमार" और ....अंत में "मृत्यु" के मुंह में चला जाएगा। मुझे 'वृद्धावस्था', 'बीमारी' व 'मृत्यु' के कारण का ज्ञान प्राप्त करना है .....

🔶 बुद्ध के विचारो से प्रभावित होकर उस स्त्री ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया.... शीघ्र ही यह बात पूरे गांव में फैल गई। गांव वासी बुद्ध के पास आए व आग्रह किया कि वे इस स्त्री के घर भोजन करने न जाएं....!!!

🔷 क्योंकि वह "चरित्रहीन" है.....

🔶 बुद्ध ने गांव के मुखिया से पूछा? .....क्या आप भी मानते हैं कि वह स्त्री चरित्रहीन है...?

🔷 मुखिया ने कहा कि मैं शपथ लेकर कहता हूं कि वह बुरे चरित्र वाली स्त्री है....। आप उसके घर न जाएं। बुद्ध ने मुखिया का दायां हाथ पकड़ा... और उसे ताली बजाने को कहा... मुखिया ने कहा...मैं एक हाथ से ताली नहीं बजा सकता...

🔶 "क्योंकि मेरा दूसरा हाथ आपने पकड़ा हुआ है"... बुद्ध बोले...इसी प्रकार यह स्वयं चरित्रहीन कैसे हो सकती है...????

🔷 ... जब तक इस गांव के "पुरुष चरित्रहीन" न हों...!!!! अगर गांव के सभी पुरुष अच्छे होते तो यह औरत ऐसी न होती इसलिए इसके चरित्र के लिए यहां के पुरुष जिम्मेदार हैं....

🔶 यह सुनकर सभी "लज्जित" हो गए..... 

🔷 ....लेकिन आजकल हमारे समाज के पुरूष "लज्जित" नही "गौर्वान्वित" महसूस करते है.....

🔶 ... क्योकि यही हमारे "पुरूष प्रधान" समाज की रीति एवं नीति है..॥

🔷 स्त्री तब तक 'चरित्रहीन' नहीं हो सकती....जब तक पुरुष चरित्रहीन न हो "......

गौतम बुद्ध

🔶 सकारात्मक सोचो

सकारात्मक सोच से ही अपना और अपने घर समाज देश का विकास होगा।

Sunday, 21 January 2018

नालायक

देर रात अचानक ही उनकी तबियत बिगड़
गयी। आहट पाते ही नालायक उनके सामने था । ड्राइवर बुलाने
की बात हुयी, पर इतनी जल्दी ड्राइवर कहाँ आ पायेगा, कहते हुये उसने सहज जिद और अपने मजबूत कंधो के सहारे उन्हे कार में बिठाया और तेज़ी से हॉस्पिटल की ओर भागा । "धीरे चला नालायक, एक काम जो इससे ठीक से हो जाए ।" वृद्ध उसपर चीखें । "आप ज्यादा बातें ना करें बाउजी, बस तेज़ साँसें लेते रहिये, हम हॉस्पिटल पहुँचने वाले हैं।" अस्पताल पहुँचकर उन्हे डाक्टरों की निगरानी में सौंप,वो
बाहर चहलकदमी करने लगा , बचपन
से आज तक अपने लिये वो नालायक
ही सुनते आया था। नालायक फिर से
फेल हो गया । नालायक को अपने यहाँ कोई
चपरासी भी ना रखे । कोई
बेवकूफ ही इस नालायक को
अपनी बेटी देगा ।
बेचारी के भाग्य फूटें थे जो इस
नालायक के पल्ले पड़ गयी ।
बाउजी की सुन दोनों भाई
और बाकी सदस्य भी उसे
नालायक ही बुलाते हैं । बस एक माँ
ही हैं जिसने उसके असल नाम को
अबतक जीवित रखा है , पर आज
अगर उसके बाउजी को कुछ हो गया तो
शायद वे भी.. इस ख़याल के आते
ही उसकी आँखे छलक
गयी और वो उनके लिये प्रार्थना में
डूब गई प्रार्थना में शक्ति थी या
समस्या मामूली, डाक्टरों ने वृद्ध को
घर जाने की अनुमति दे दी
। घर लौटकर उनके कमरे में छोड़ते हुये वृद्ध
एक बार फिर चीखें, " छोड़ नालायक !
तुझे तो लगा होगा कि बूढ़ा अब लौटेगा ही
नहीं ।" उदास वो उस कमरे से निकला,
तो वृद्धा से रहा नहीं गया , " इतना सब
तो करता है, बावजूद इसके आपके लिये वो नालायक
ही है ?" इसबार वृद्ध ने आश्चर्य
भरी नजरों से उनकी ओर
देखा और फिर नज़रें नीची
करते हुये बोले, " आप भी शायद मेरे
शब्दों से ही धोखा खा
गयीं ? अरे , क्या कमी है
आपके इस बेटे में । अपना परिवार, हम दोनों को,
घर-मकान , पुश्तैनी कारोबार , रिश्तेदार
और रिश्तेदारी सब कुछ तो
बखूबी सम्भाल रहा है , जबकि
आपके दोनों लायक बेटे सिर्फ अपने
बीबी और बच्चों को ।
इतना सब के बाद भी मैं इसे बेटा कह
के नहीं बुला पाता हूँ , गले से
नहीं लगा पाता हूँ तो दुख मुझे
भी होता है, पर उससे भी
अधिक डर लगता है कि कहीं ये
भी लायक ना बन जाये । आप चाहें तो
इसे मेरा स्वार्थ ही कह लें ।" कहते
हुये उन्होंने अपने हाथ जोड़ दिये जिसे वृद्धा ने
झट से अपनी हथेलियों में भर लिया ।
दूसरी ओर दरवाज़े पर खड़ा वो
आंसुओं में तरबतर हो गया था । उसे लगा कि दौड़
कर अपने बाउजी के गले से लग जाये
पर ऐसा करते ही उसके
बाउजी झेंप नहीं जाते, वो
अपने कमरे की ओर बढ़ गया ।