Thursday, 31 December 2015

अंग्रेजी नववर्ष

हवा लगी पश्चिम की सारे कुप्पा बनकर फूल गए
ईस्वी सन तो याद रहा अपना संवत्सर भूल गए

चारों तरफ नए साल का ऐसा मचा है हो-हल्ला
बेगानी शादी में नाचे ज्यों दीवाना अब्दुल्ला

धरती ठिठुर रही सर्दी से घना कुहासा छाया है
कैसा ये नववर्ष है जिससे सूरज भी शरमाया है

सूनी है पेड़ों की डालें, फूल नहीं हैं उपवन में
पर्वत ढके बर्फ से सारे, रंग कहां है जीवन में

बाट जोह रही सारी प्रकृति आतुरता से फागुन का
जैसे रस्ता देख रही हो सजनी अपने साजन का

अभी ना उल्लासित हो इतने आई अभी बहार नहीं
हम नववर्ष मनाएंगे, न्यू ईयर हमें स्वीकार नहीं

लिए बहारें आँचल में जब चैत्र प्रतिपदा आएगी
फूलों का श्रृंगार करके धरती दुल्हन बन जाएगी

मौसम बड़ा सुहाना होगा दिल सबके खिल जाएँगे
झूमेंगी फसलें खेतों में, हम गीत खुशी के गाएँगे

उठो खुद को पहचानो यूँ कबतक सोते रहोगे तुम
चिन्ह गुलामी के कंधों पर कबतक ढोते रहोगे तुम

अपनी समृद्ध परंपराओं का मिलकर मान बढ़ाएंगे भारतवर्ष के वासी अब अपना नववर्ष मनाएंगे

💐हमारी संस्कृति💐 🌷💐हमारी विरासत💐🌷

Friday, 18 December 2015

ईमानदारी


बड़ी कंपनी में बड़ी नौकरी के लिए  साक्षात्कार था सैकड़ों लोगों में से सिर्फ दो अभ्यर्थी चुने गए। दोनों योग्यता में खरे उतरे। रिक्त स्थान एक और अच्छे अभ्यर्थी दो। क्या किया जाए। कंपनी प्रबंधक ने सोचा कि अंतिम चयन के पहले अभ्यर्थियों की और परीक्षा ली जाए। दोनों को मुंबई बुलाया गया। आलीशान होटल में अलग-अलग कमरे बुक किए गए। कंपनी प्रबंधक ने उनका साक्षात्कार लिया। उन्हें जांचा- परखा। प्रबंधक को दोनों अच्छे लगे। लेकिन चुनना तो एक को ही था। दोनों में किसे श्रेष्ठ
मानें ? प्रबंधक को एक उपाय सूझा। उसने उस पर अमल किया। अगले दिन प्रबंधक दोनों अभ्यर्थियों को हवाई अड्डे पर पहुंचाने के लिए गया। पहले अभ्यर्थी ने मिलते ही एक बंद पैकेट प्रबंधक को देते हुए कहा, “सर ! शायद कल आप यह पैकेट मेरे कमरे में भूल गए थे। इस पर प्रबंधक ने पूछा, क्या है इसमें ? पहले अभ्यर्थी ने कहा, सर ! यह पैकेट मेरा नहीं है, फिर मुझे कैसे मालूम होगा कि इसमें क्या है ? यह अगर आपका नहीं है तो होटल वालों को दे दें। शायद इसका अधिकारी उनके पास आएगा। कंपनी प्रबंधक ने ‘हां’ में सिर हिलाया। इतने में दूसरा अभ्यार्थी भी आया। प्रबंधक ने दोनों को अपनी कार में बिठाकर हवाईअड्डे पर छोड़ा। दोनों अभ्यर्थी प्रबंधक महोदय से हाथ मिलाकर जाने लगे, तब कंपनी प्रबंधक ने दूसरे अभ्यर्थी को बुलाकर कहा, “देखिए, कल मैं आपके कमरे में 10 हजार रुपए एक पैकेट में रख आया था। कृपया उसे वापस लौटाएं। कंपनी प्रबंधक के मुंह से जैसे ही यह बात निकली दूसरे अभ्यर्थी का चेहरा फक पड़ गया। उसने पैकेट लौटा दिया।पहला अभ्यर्थी इस घटना से काफी घबराया  था। तभी कंपनी प्रबंधक ने पहले अभ्यर्थी के हाथ में नियुक्ति पत्र और बीस हजार रुपए रखकर कहा, “आप ईमानदार हैं। इस नौकरी के आप ही सच्चे अधिकारी हैं। और यह छोटी सी रकम है आपकी ईमानदारी के लिए, मेरी ओर से एक छोटा सा तोहफा।”
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क्या यह बात सच नहीं है कि बेईमान भी चाहता है कि उसके साथी ईमानदार रहें। कारण स्पष्ट है, ईमानदारी के बिना संसार उलझ जाएगा। इसलिए ईमानदारी को अपनाएं और अपने लक्ष्य की ओर बिना किसी भय के बेहिचक बढ़ते जाएं। आपको कोई नहीं रोक पाएगा।

Monday, 14 December 2015

हार- जीत का फैसला

हार- जीत का फैसला !

बहुत समय पहले की बात है। आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच सोलह दिन तक लगातार शास्त्रार्थ चला। शास्त्रार्थ मेँ निर्णायक थीँ- मंडन मिश्र की धर्म पत्नी देवी भारती। हार- जीत का निर्णय होना बाक़ी था, इसी बीच देवी भारती को किसी आवश्यक कार्य से कुछ समय के लिये बाहर जाना पड़ गया।

लेकिन जाने से पहले देवी भारती नेँ दोनों ही विद्वानोँ के गले मेँ एक- एक फूल माला डालते हुए कहा, येँ दोनों मालाएँ मेरी अनुपस्थिति मेँ आपके हार और जीत का फैसला करेंगी। यह कहकर देवी भारती वहाँ से चली गईँ। शास्त्रार्थ की प्रकिया आगे चलती रही।

कुछ देर पश्चात् देवी भारती अपना कार्य पुरा करके लौट आईँ। उन्होंने अपनी निर्णायक नजरों से शंकराचार्य और मंडन मिश्र को बारी- बारी से देखा और अपना निर्णय सुना दिया। उनके फैसले के अनुसार आदि शंकराचार्य विजयी घोषित किये गये और उनके पति मंडन मिश्र की पराजय हुई थी।

सभी दर्शक हैरान हो गये कि बिना किसी आधार के इस विदुषी ने अपने पति को ही पराजित करार दे दिया। एक विद्वान नेँ देवी भारती से नम्रतापूर्वक जिज्ञासा की- हे ! देवी आप तो शास्त्रार्थ के मध्य ही चली गई थीँ फिर वापस लौटते ही आपने ऐसा फैसला कैसे दे दिया ??

देवी भारती ने मुस्कुराकर जवाब दिया- जब भी कोई विद्वान शास्त्रार्थ मेँ पराजित होने लगता है, और उसे जब हार की झलक दिखने लगती है तो इस वजह से वह क्रुध्द हो उठता है और मेरे पति के गले की माला उनके क्रोध की ताप से सूख चुकी है जबकि शंकराचार्य जी की माला के फूल अभी भी पहले की भांति ताजे हैँ। इससे ज्ञात होता है कि शंकराचार्य की विजय हुई है।

विदुषी देवी भारती का फैसला सुनकर सभी दंग रह गये, सबने उनकी काफी प्रशंसा की।

दोस्तों क्रोध मनुष्य की वह अवस्था है जो जीत के नजदीक पहुँचकर हार का नया रास्ता खोल देता है। क्रोध न सिर्फ हार का दरवाजा खोलता है बल्कि रिश्तों मेँ दरार का कारण भी बनता है। इसलिये कभी भी अपने क्रोध के ताप से अपने फूल रूपी गुणों को मुरझाने मत दीजिये।

Saturday, 12 December 2015

परमात्मा प्राप्ति किसे होती  है???

परमात्मा प्राप्ति किसे होती  हॆ????

एक सुन्दर कहानी है:----

एक राजा था।वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था।
वह नित्य अपने इष्ट देव की बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ और याद करता था।
एक दिन इष्ट देव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा---"राजन् मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। बोलो तुम्हारी  कोई इछा हॆ?"
प्रजा को चाहने वाला राजा बोला---"भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ हॆ।आपकी कृपा से राज्य मे सब प्रकार सुख-शान्ति हॆ। फिर भी मेरी एक ईच्छा हॆ कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी दर्शन  दीजिये।"
"यह तो सम्भव नहीं  है ।" ---भगवान ने राजा को समझाया ।परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जिद्द् करने लगा। आखिर भगवान को अपने साधक के सामने झुकना पडा ओर वे बोले,--"ठीक है, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाडी के पास लाना। मैं पहाडी के ऊपर से दर्शन दूँगा।"

राजा अत्यन्त प्रसन्न. हुअा और  भगवान को धन्यवाद दिया।
अगले दिन सारे नगर मे ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड के नीचे मेरे साथ पहुँचे,वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देगें।

दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा।
चलते-चलते रास्ते  मे एक स्थान पर तांबे कि सिक्कों का पहाड देखा। प्रजा में से कुछ एक उस ओर भागने लगे।तभी ज्ञानी राजा ने सबको सर्तक किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे,क्योकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो,इन तांबे के सिक्कों  के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो।

परन्तु लोभ-लालच मे वशीभूत कुछ एक प्रजा तांबे कि सिक्कों वाली पहाडी की ओर भाग गयी और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि ओर चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे,पहले ये सिक्कों  को समेट ले, भगवान से तो फिर कभी मिल लेगे।

राजा खिन्न मन से आगे बढे। कुछ दूर चलने पर चांदी कि सिक्कों का चमचमाता पहाड दिखाई दिया।इस वार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग, उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों को गठरी बनाकर अपनी घर की ओर चलने लगे।उनके मन मे विचार चल रहा था कि,ऐसा मौका बार-बार नहीं  मिलता है । चांदी के इतने सारे सिक्के  फिर मिले न मिले, भगवान तो फिर कभी मिल जायेगें

इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड नजर आया।अब तो प्रजाजनो में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस ओर भागने लगे। वे भी दूसरों की तरह सिक्कों  कि गठरी लाद कर अपने-अपने घरों की ओर चल दिये।

अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे।राजा रानी से कहने लगे---"देखो कितने लोभी ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं  जानते हॆ। भगवान के सामने सारी  दुनियां कि दौलत क्या चीज हॆ?" सही  बात है--रानी ने राजा कि बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे।

कुछ दुर चलने पर राजा ओर रानी  ने देखा कि सप्तरंगि आभा बिखरता हीरों का पहाड हॆ।अब तो रानी से रहा नहीं गया,हीरों के आर्कषण से वह भी दौड पडी,और हीरों कि गठरी बनाने लगी ।फिर भी उसका मन नहीं  भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बांधने लगी ।     वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये,परंतु हीरों का तृष्णा अभी भी नहीं  मिटी।यह देख राजा को अत्यन्त ग्लानि ओर विरक्ति हुई।बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये।

वहाँ सचमुच भगवान खडे उसका इन्तजार कर रहे थे।राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये ओर पुछा --"कहाँ  है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे प्रियजन। मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हूॅ।"

राजा ने शर्म और आत्म-ग्लानि से अपना सर झुका दिया।तब भगवान ने राजा को समझाया--
"राजन जो लोग भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हॆ, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती ओर वह मेरे स्नेह तथा आर्शिवाद से भी वंचित रह जाते हॆ।"

सार......
जो आत्मायें अपनी मन ओर बुद्धि से भगवान पर कुर्बान जाते हैं,
और सर्वसम्बधों से प्यार करते है...........वह भगवान के प्रिय बनते हैं।

Thursday, 3 December 2015

वक्त

कल मैं दफ्तर से जल्दी घर चला आया। आम तौर पर रात में 10 बजे के बाद आता हूं, कल 8 बजे ही चला आया।
सोचा था घर जाकर थोड़ी देर पत्नी से बातें करूंगा, फिर कहूंगा कि कहीं बाहर खाना खाने चलते हैं। बहुत साल पहले, जब हमारी सैलरी कम थी, हम ऐसा करते थे।
घर आया तो पत्नी टीवी देख रही थी। मुझे लगा कि जब तक वो ये वाला सीरियल देख रही है, मैं कम्यूटर पर कुछ मेल चेक कर लूं। मैं मेल चेक करने लगा, तभी दफ्तर से फोन आ गया कि इस ख़बर का क्या करूं, उस ख़बर का क्या करूं और मैं उलझ गया अपने काम में। कुछ देर बाद पत्नी चाय लेकर आई, तो मैं चाय पीता हुआ दफ्तर के काम करने लगा।
अब मन में था कि पत्नी के साथ बैठ कर बातें करूंगा, फिर खाना खाने बाहर जाऊंगा, पर कब 8 से 11 बज गए, पता ही नहीं चला।
पत्नी ने वहीं टेबल पर खाना लगा दिया, मैं चुपचाप खाना खाने लगा। खाना खाते हुए मैंने कहा कि खा कर हम लोग नीचे टहलने चलेंगे, गप करेंगे। पत्नी खुश हो गई।
हम खाना खाते रहे, इस बीच ‘ज़िंदगी’ चैनल पर मेरी पसंद का सीरियल आने लगा और मैं खाते-खाते सीरियल में डूब गया। सीरियल देखते हुए सोफा पर ही मैं सो गया था।
जब नींद खुली तब आधी रात हो चुकी थी। 
बहुत अफसोस हुआ। मन में सोच कर घर आया था कि जल्दी आने का फायदा उठाते हुए आज कुछ समय पत्नी के साथ बिताऊंगा। पर यहां तो शाम क्या आधी रात भी निकल गई।
ऐसा ही होता है, ज़िंदगी में। हम सोचते कुछ हैं, होता कुछ है। हम सोचते हैं कि एक दिन हम जी लेंगे, पर हम कभी नहीं जीते। हम सोचते हैं कि एक दिन ये कर लेंगे, पर नहीं कर पाते।
आधी रात को सोफे से उठा, हाथ मुंह धो कर बिस्तर पर आया तो पत्नी सारा दिन के काम से थकी हुई सो गई थी। मैं चुपचाप बेडरूम में कुर्सी पर बैठ कर कुछ सोच रहा था।
पच्चीस साल पहले इस लड़की से मैं पहली बार मिला था। पीले रंग के लहंगे में मुझे मिली थी। फिर मैने इससे शादी की थी। मैंने वादा किया था कि सुख में, दुख में ज़िंदगी के हर मोड़ पर मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।
पर ये कैसा साथ? मैं सुबह जागता हूं अपने काम में व्यस्त हो जाता हूं। वो सुबह जागती है मेरे लिए चाय बनाती है। चाय पीकर मैं कम्यूटर पर संसार से जुड़ जाता हूं, वो नाश्ते की तैयारी करती है। फिर हम दोनों दफ्तर के काम में लग जाते हैं, मैं दफ्तर के लिए तैयार होता हूं, वो साथ में मेरे लंच का इंतज़ाम करती है। फिर हम दोनों भविष्य के काम में लग जाते हैं।
मैं एकबार दफ्तर चला गया, तो इसी बात में अपनी शान समझता हूं कि मेरे बिना मेरा दफ्तर नहीं चलता, वो अपना काम करके डिनर की तैयारी करती है।
देर रात मैं घर आता हूं और खाना खाते हुए ही निढाल हो जाता हूं। एक पूरा दिन खर्च हो जाता है, जीने की तैयारी में।
वो पीले लहंगे वाली लड़की मुझ से कभी शिकायत नहीं करती। क्यों नहीं करती मैं नहीं जानता। पर मुझे खुद से शिकायत है। आदमी जिससे सबसे ज्यादा प्यार करता है, सबसे कम उसी की परवाह करता है। क्यों?
***
मुझे तो याद है कि पिताजी भी दफ्तर जाते थे। मां भी खाना पकाती थी। पर तब समय हुआ करता था। सबके पास एक दूसरे के लिए समय था। लोग एक दूसरे से बातें करते थे। एक दूसरे के बारे में सोचते थे। लोग पर्व त्योहार पर एक दूसरे के घर जाते थे। पर अब तो लगता है जैसे किसी ने समय चुरा लिया हो। सब कुछ है, समय ही नहीं है।
कई दफा लगता है कि हम खुद के लिए अब काम नहीं करते। हम किसी अज्ञात भय से लड़ने के लिए काम करते हैं। हम जीने के पीछे ज़िंदगी बर्बाद करते हैं।
कल से मैं सोच रहा हूं, वो कौन सा दिन होगा जब हम जीना शुरू करेंगे। क्या हम गाड़ी, टीवी, फोन, कम्यूटर, कपड़े खरीदने के लिए जी रहे हैं?
***
मैं तो सोच ही रहा हूं, आप भी सोचिए ~
कि ज़िंदगी बहुत छोटी होती है। उसे यूं जाया मत कीजिए। अपने प्यार को पहचानिए। उसके साथ समय बिताइए। अग्नि के फेरे लेते हुए जिसके सुख-दुख में शामिल होने का वादा आपने किया था, उसके सुख-दुख को पूछिए तो सही।
एक दिन अफसोस करने से बेहतर है, सच को आज ही समझ लेना कि ज़िंदगी मुट्ठी में रेत की तरह होती है। कब मुट्ठी से वो निकल जाएगी, पता भी नहीं चलेगा।
तो क्या सोचा आपने ....!!!!

Wednesday, 2 December 2015

पोस्टमैन


एक पोस्टमैन ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा,"चिट्ठी ले लीजिये।"अंदर से एक बालिका की आवाज आई,"आ रही हूँ।" लेकिन तीन-चार मिनट तक कोई न आया तो पोस्टमैन ने फिर कहा,"अरे भाई!मकान में कोई है क्या,अपनी चिट्ठी ले लो।"लड़की की फिर आवाज आई,"पोस्टमैन साहब,दरवाजे के नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए,मैं आ रही हूँ।"पोस्टमैन ने कहा,"नहीं, मैं खड़ा हूँ, रजिस्टर्ड चिट्ठी है, पावती पर तुम्हारे साइन चाहिये।" करीबन छह-सात मिनट बाद दरवाजा खुला। पोस्टमैन इस देरी के लिए झल्लाया हुआ तो था ही और उस पर चिल्लाने वाला था ही, लेकिन दरवाजा खुलते ही वह चौंक गया, सामने एक अपाहिज कन्या जिसके पांव नहीं थे, सामने खड़ी थी। पोस्टमैन चुपचाप पत्र देकर और उसके साइन लेकर चला गया। हफ़्ते, दो हफ़्ते में जब कभी उस लड़की के लिए डाक आती, पोस्टमैन एक आवाज देता और जब तक वह कन्या न आती तब तक खड़ा रहता। एक दिन उसने पोस्टमैन को नंगे पाँव देखा। दीपावली नजदीक आ रही थी। उसने सोचा पोस्टमैन को क्या ईनाम दूँ। एक दिन जब पोस्टमैन डाक देकर चला गया,तब उस लड़की ने,जहां मिट्टी में पोस्टमैन के पाँव के निशान बने थे, उन पर काग़ज़ रख कर उन पाँवों का चित्र उतार लिया। अगले दिन उसने अपने यहाँ काम करने वाली बाई से उस नाप के जूते मंगवा लिये। दीपावली आई और उसके अगले दिन पोस्टमैन ने गली के सब लोगों से तो ईनाम माँगा और सोचा कि अब इस बिटिया से क्या इनाम लेना? पर गली में आया हूँ तो उससे मिल ही लूँ। उसने दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई,"कौन?"पोस्टमैन, उत्तर मिला। बालिका हाथ में एक गिफ्ट पैक लेकर आई और कहा,"अंकल, मेरी तरफ से दीपावली पर आपको यह भेंट है।"पोस्टमैन ने कहा,"तुम तो मेरे लिए बेटी के समान हो, तुमसे मैं गिफ्ट कैसे लूँ?" कन्या ने आग्रह किया कि मेरी इस गिफ्ट के लिए मना नहीं करें।"ठीक है कहते हुए पोस्टमैन ने पैकेट ले लिया। बालिका ने कहा,"अंकल इस पैकेट को घर ले जाकर खोलना। घर जाकर जब उसने पैकेट खोला तो विस्मित रह गया, क्योंकि उसमें एक जोड़ी जूते थे।उसकी आँखें भर आई। अगले दिन वह ऑफिस पहुंचा और पोस्टमास्टर से फरियाद की कि उसका तबादला फ़ौरन कर दिया जाए। पोस्टमास्टर ने कारण पूछा,तो पोस्टमैन ने वे जूते टेबल पर रखते हुए सारी कहानी सुनाई और भीगी आँखों और रुंधे कंठ से कहा,"आज के बाद मैं उस गली में नहीं जा सकूँगा।उस अपाहिज बच्ची ने तो मेरे नंगे पाँवों को तो जूते दे दिये पर मैं उसे पाँव कैसे दे पाऊँगा?"
संवेदनशीलता का यह श्रेष्ठ दृष्टांत है। संवेदनशीलता यानि,दूसरों के दुःख-दर्द को समझना, अनुभव करना और उसके दुःख-दर्द में भागीदारी करना,उसमें शरीक होना। यह ऐसा मानवीय गुण है जिसके बिना इंसान अधूरा है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि वह हमें संवेदनशीलता रूपी आभूषण प्रदान करें ताकि हम दूसरों के दुःख-दर्द को कम करने में योगदान कर सकें।संकट की घड़ी में कोई यह नहीं समझे कि वह अकेला है, अपितु उसे महसूस हो कि सारी मानवता उसके साथ है।

Monday, 23 November 2015

हीरा

एक आदमी ने भगवान बुद्ध  से पुछा : जीवन का मूल्य क्या है?

बुद्ध  ने उसे एक Stone दिया
और कहा : जा और इस stone का
मूल्य पता करके आ , लेकिन ध्यान
रखना stone को बेचना नही है I

वह आदमी stone को बाजार मे एक संतरे वाले के पास लेकर गया और बोला : इसकी कीमत क्या है?

संतरे वाला चमकीले stone को देख
कर बोला, "12 संतरे लेजा और इसे
मुझे दे जा"

आगे एक सब्जी वाले ने उस चमकीले stone को देखा और कहा
"एक बोरी आलू ले जा और
इस stone को मेरे पास छोड़ जा"

आगे एक सोना बेचने वाले के
पास गया उसे stone दिखाया सुनार
उस चमकीले stone को देखकर बोला,  "50 लाख मे बेच दे" l

उसने मना कर दिया तो सुनार बोला "2 करोड़ मे दे दे या बता इसकी कीमत जो माँगेगा वह दूँगा तुझे..

उस आदमी ने सुनार से कहा मेरे गुरू
ने इसे बेचने से मना किया है l

आगे हीरे बेचने वाले एक जौहरी के पास गया उसे stone दिखाया l

जौहरी ने जब उस बेसकीमती रुबी को देखा , तो पहले उसने रुबी के पास एक लाल कपडा बिछाया फिर उस बेसकीमती रुबी की परिक्रमा लगाई माथा टेका l

फिर जौहरी बोला , "कहा से लाया है ये बेसकीमती रुबी? सारी कायनात , सारी दुनिया को बेचकर भी इसकी कीमत नही लगाई जा सकती
ये तो बेसकीमती है l"

वह आदमी हैरान परेशान होकर सीधे बुद्ध  के पास आया l

अपनी आप बिती बताई और बोला
"अब बताओ भगवान ,
मानवीय जीवन का मूल्य क्या है?

बुद्ध  बोले :

संतरे वाले को दिखाया उसने इसकी कीमत "12 संतरे" की बताई l

सब्जी वाले के पास गया उसने
इसकी कीमत "1 बोरी आलू" बताई l

आगे सुनार ने "2 करोड़" बताई l
और
जौहरी ने इसे "बेसकीमती" बताया l

अब ऐसा ही मानवीय मूल्य का भी है l

तू बेशक हीरा है..!!
लेकिन,
सामने वाला तेरी कीमत,
अपनी औकात - अपनी जानकारी -  अपनी हैसियत से लगाएगा।

घबराओ मत दुनिया में..
तुझे पहचानने वाले भी मिल जायेगे।

Friday, 6 November 2015

ध्रुव चरित्र


मनु शतरूपा के एक पुत्र उत्तानपाद हुए । राजा उत्तानपाद की सुरुचि और सुनीति नाम की दो रानियां थीं । सुरुचि के पुत्र का नाम उत्तम था । सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव था । राजा उत्तानपाद रानी सुरुचि को बहुत चाहते थे । राजा उत्तानपाद रानी सुरुचि को घर के अंदर रखते और रानी सुनीति को घर के बाहर रखते थे । एक बार राजा और रानी सुरुचि राज दरबार में बैठे थे और राज कुमार उत्तम राजा की गोदी में बैठे थे ।

इतने में राजकुमार ध्रुव कहीं से खेलते हुए आए और राजा की गोदी में बैठने गए । इस बात पर रानी सुरुचि बहुत नाराज हो गयीं और ध्रुव जी का हैथ पकड़ कर गोदी से नीचे उतार कर बोलीं कि तुम अगर राजा की गोद पर बैठना चाहते हो तो तुम्हें मेरे कोख से जन्म लेना पड़ेगा । बालक ध्रुव रोते हुए अपनी मां के पास गए और उन्हें सब बात बताई । सुनीति ने प्रार्थना करो । ध्रुव जी घर से मां के कथनानुसार जंगल में तपस्या करने चले गए । नारद जी ने ध्रुव जी को भगवत् प्राप्ति का मार्ग बताया । बहुत समय तक तपस्या करने के बाद ध्रुव जी को भगवान के दर्शन हुए और एक अटल पद (ध्रुवतारा) की प्राप्ति हुई ।

इस प्रकरण में राजा उत्तानपाद जीवात्मा का रूप हैं जिनका शाखाएं जमीन के नीचे और मस्तिष्क ऊपर की तरफ होता है । सुरुचि = प्रिय (स्वरूचि) मन के अनुरुप, विषयासक्ति व अविवेक जो अपनी रुचि के अनुसार बात करें । प्रत्येक व्यक्ति सुरुचि को अपने साथ यानी कि घर के अंदर रखता है ।
सुनीति = श्रेय, जीवन का कल्याण, सुंदर नीति । हर व्यक्ति नीति की बात दूसरों को शिक्षा देने के लिए ही करता है ।
"पर उपदेश कुशल बहुतेरे" ।

इसलिए राजा भी सुनीति को घर के बाहर रखते थे । नीति के मार्ग पर चलकर ही अटल सत्य (ध्रुव) की प्राप्ति होती है । सुनीति की सुंदर शिक्षा के कारण ध्रुव जी भगवान के साक्षात् दर्शन कर पाए । जननी वहीं है जो अपने पुत्र को भगवान के प्रेम की ओर मोड़ दे (न कि अपनी ममता की ओर मोड़े) सुनीति जननी है । मानस में सुमित्रा जननी हुई । अपनी ममता के बंधन को तोड़कर प्रभु से प्रेम करा दे, वहीं जननी है । "भक्ति संस्कारान् जनयति सा जननी" । यदि संतान पैदा करने मात्र से मां को जननी कहा जाता तो गाय और बकरी भी जननी कहलाती । जीवन सहज एवं स्वाभाविक होना चाहिए । बनाने और सजाने मात्र से प्रभु नहीं मिलते ।

Thursday, 5 November 2015

आम और लीची

दो किसान थे एक ने आम उगाए थे तो दूसरे ने लीची।
अपने-अपने फल बाजार में बेचने के बाद उन दोनों ने अपने लिए पांच-पांच किलो फल बचा लिए थे।
वापस लौटते समय दोनों रास्ते में मिले। दोनों में बात होने लगी।
आम वाला किसान बोला - मैंने फल बचा तो लिए, लेकिन इस बार खूब फसल हुई, हम लोगों ने खूब आम खाए।
अब खाने का बिल्कुल भी मन नहीं है।
लीची वाले किसान ने कहा - यही हाल मेरा भी रहा।
दोनों ने यह फैसला किया कि दोनों आपस में फल बदल लेते हैं।
आम वाले ने लीची ले लीं और लीची वाले किसान ने आम।
लेकिन आम वाला किसान बहुत लालची था।
उसने नजर बचाकर कुछ आम बचाकर रख लिए।
लीची वाला किसान आम पाकर बहुत खुश हुआ।
घर जाकर उसने पूरे परिवार को आम खिलाए और उसे बड़ी अच्छी नींद आई।
लेकिन आम वाला किसान बहुत व्यथित रहा उसे रात भर नींद नहीं आ सकी।
उसे आत्मग्लानि नहीं हो रही थी, बल्कि उसे यह लग रहा था कि कहीं उसकी तरह लीची वाले किसान ने भी कुछ लीचियां छुपाकर तो नहीं रख ली हैं।

इस छोटी सी कथा मर्म यह है की गलत काम करने वाले को दूसरा व्यक्ति भी गलत ही नजर आता है।
इसी संशय से उसे दुख मिलता है।

Saturday, 31 October 2015

सुखी जीवन का रहस्य

एक बार यूनान के मशहूर दार्शनिक सुकरात भ्रमण करते हुए एक नगर में गए। वहां उनकी मुलाकात एक वृद्ध सज्जन से हुई, दोनों आपस में काफी घुलमिल गए। वृद्ध सज्जन आग्रहपूर्वक सुकरात को अपने निवास पर ले गए। भरा-पूरा परिवार था उनका, घर में बहु-बेटे, पौत्र-पौत्रियां सभी थे।

सुकरात ने बुजुर्ग से पूछा- “आपके घर में तो सुख-समृद्धि का वास है। वैसे अब आप करते क्या हैं?"

इस पर वृद्ध ने कहा- “अब मुझे कुछ नहीं करना पड़ता। ईश्वर की दया से हमारा अच्छा कारोबार है, जिसकी सारी जिम्मेदारियां अब बेटों को सौंप दी हैं। घर की व्यवस्था हमारी बहुएं संभालती हैं। इसी तरह जीवन चल रहा है।"

यह सुनकर सुकरात बोले- "किन्तु इस वृद्धावस्था में भी आपको कुछ तो करना ही पड़ता होगा। आप बताइए कि बुढ़ापे में आपके इस सुखी जीवन का रहस्य क्या है?"

वह वृद्ध सज्जन मुस्कराए और बोले- “मैंने अपने जीवन के इस मोड़ पर एक ही नीति को अपनाया है कि दूसरों से ज्यादा अपेक्षाएं मत पालो और जो मिले, उसमें संतुष्ट रहो। मैं और मेरी पत्नी अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व अपने बेटे-बहुओं को सौंपकर निश्चिंत हैं। अब वे जो कहते हैं, वह मैं कर देता हूं और जो कुछ भी खिलाते हैं, खा लेता हूं। अपने पौत्र- पौत्रियों के साथ हंसता-खेलता हूं। मेरे बच्चे जब कुछ भूल करते हैं, तब भी मैं चुप रहता हूं। मैं उनके किसी कार्य में बाधक नहीं बनता। पर जब कभी वे मेरे पास सलाह-मशविरे के लिए आते हैं तो मैं अपने जीवन के सारे अनुभवों को उनके सामने रखते हुए उनके द्वारा की गई भूल से उत्पन्न् दुष्परिणामों की ओर सचेत कर देता हूं। अब वे मेरी सलाह पर कितना अमल करते या नहीं करते हैं, यह देखना और अपना मन व्यथित करना मेरा काम नहीं है। वे मेरे निर्देशों पर चलें ही, मेरा यह आग्रह नहीं होता। परामर्श देने के बाद भी यदि वे भूल करते हैं तो मैं चिंतित नहीं होता। उस पर भी यदि वे मेरे पास पुन: आते हैं तो मैं पुन: नेक सलाह देकर उन्हें विदा करता हूं।"

बुजुर्ग सज्जन की यह बात सुनकर सुकरात बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा- “इस आयु में जीवन कैसे जिया जाए, यह आपने बखूबी समझ लिया है।"

शुभ प्रभात । आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलमय हो ।

Saturday, 24 October 2015

दर्पण

“बुरा जो देखन मै चला, बुरा न मिल्या कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥“

पुराने जमाने की बात है। एक गुरुकुल के आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विद्या पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय उन्होंने आशीर्वाद के रूप में उसे एक ऐसा दिव्य दर्पण भेंट किया, जिसमें व्यक्ति के मन के भाव को दर्शाने की क्षमता थी।

शिष्य उस दिव्य दर्पण को पाकर प्रसन्न हो उठा। उसने परीक्षा लेने की जल्दबाजी में दर्पण का मुंह सबसे पहले गुरुजी के सामने कर दिया। वह यह देखकर आश्चर्यचकित हो गया कि गुरुजी के हृदय में मोह, अहंकार, क्रोध आदि दुर्गुण परिलक्षित हो रहे थे। इससे उसे बड़ा दुख हुआ। वह तो अपने गुरुजी को समस्त दुर्गुणों से रहित सत्पुरुष समझता था।
दर्पण लेकर वह गुरुकूल से रवाना हो गया। उसने अपने कई मित्रों तथा अन्य परिचितों के सामने दर्पण रखकर परीक्षा ली। सब के हृदय में कोई न कोई दुर्गुण अवश्य दिखाई दिया। और तो और अपने माता व पिता की भी वह दर्पण से परीक्षा करने से नहीं चूका। उनके हृदय में भी कोई न कोई दुर्गुण देखा, तो वह हतप्रभ हो उठा। एक दिन वह दर्पण लेकर फिर गुरुकुल पहुंचा।

उसने गुरुजी से विनम्रतापूर्वक कहा- “गुरुदेव, मैंने आपके दिए दर्पण की मदद से देखा कि सबके दिलों में नाना प्रकार के दोष हैं।“

तब गुरु जी ने दर्पण का रुख शिष्य की ओर कर दिया। शिष्य दंग रह गया. क्योंकि उसके मन के प्रत्येक कोने में राग,द्वेष, अहंकार, क्रोध जैसे दुर्गुण विद्यमान थे।

गुरुजी बोले- “वत्स यह दर्पण मैंने तुम्हें अपने दुर्गुण देखकर जीवन में सुधार लाने के लिए दिया था दूसरों के दुर्गुण देखने के लिए नहीं। जितना समय तुमने दूसरों के दुर्गुण देखने में लगाया उतना समय यदि तुमने स्वयं को सुधारने में लगाया होता तो अब तक तुम्हारा व्यक्तित्व बदल चुका होता। मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह दूसरों के दुर्गुण जानने में ज्यादा रुचि रखता है। वह स्वयं को सुधारने के बारे में नहीं सोचता। इस दर्पण की यही सीख है जो तुम नहीं समझ सके।“