Tuesday, 28 September 2021

निर्भर

एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई।

शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। 

वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। 

दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई।

 वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था। उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे।

वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों भी करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फस गए। दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था। 

थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है? 

बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं। 

गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है? 

उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है।

गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा?

थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया। 

जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।

गाय समर्पित ह्रदय का प्रतीक है। बाघ अहंकारी मन है और मालिक ईश्वर का प्रतीक है। कीचड़ यह संसार है। और यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है।

किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है लेकिन उसकी अति नहीं होनी चाहिए। आपको किसी मित्र, किसी गुरु, किसी सहयोगी की हमेशा ही जरूरत होती है।

Sunday, 26 September 2021

उधार

"सर!.वह जो सबसे पीछे वाली मेज पर बुजुर्ग बैठे हैं ना,. वह वही है जो यहां पहले भी दो बार उधार खाना खाकर चले गए थे।"
उस रेस्त्रां के स्टाफ ने आकर धीरे से उस रेस्त्रां के मालिक रत्नेश जी के कान में यह बात बताया,.
"उनका आज का आर्डर कितने का है?"
रत्नेश जी ने अपने उस कर्मचारी से जानना चाहा।
"सर!.आर्डर तो वह कभी ज्यादा का नहीं करते हर बार की तरह आज भी साठ रुपए का ही ऑर्डर है,.तड़के वाली दाल के साथ दो रोटी।"
उस बुजुर्ग का साधारण सा भोजन का आर्डर सुनकर रत्नेश जी सोचने लगे..
"जरूर इनकी कोई मजबूरी रही होगी इसलिए पैसे नहीं चुका पाए होंगे।"
"नहीं सर!.ऐसे लोगों को मुफ्त की खाने की आदत होती है इसलिए पैसे नहीं चुकाते और ऐसे ही उधार रहा कह कर टालते रहते हैं।"
रेस्त्रां के उस कर्मचारी ने हिकारत भरी निगाहों से उस ओर देखा लेकिन रत्नेश जी ने अपने कर्मचारी की सोच को दरकिनार कर सबसे पिछली मेज पर बैठे उस बुजुर्ग को गौर से देखा..
"ठीक है!.तुम जाओ मैं देखता हूंँ।"
रत्नेश जी ने गौर किया कि साधारण वेशभूषा वाले उस बुजुर्ग के चेहरे पर उम्र की थकान साफ झलक रही थी। साधारण सा कुर्ता-पायजामा पहने अपने कंधे पर गमछा रखे वह बुजुर्ग किसी बहुत ही साधारण परिवेश में रचा-बसा मालूम पड़ रहा था।
खैर भोजन समाप्त कर वह बुजुर्ग सीधा रेस्त्रां के काउंटर पर रत्नेश जी के करीब आया..
"मेरा बिल कितने का हुआ?"
भोजन का वर्तमान और पिछले उधार के भुगतान की रसीद पहले से ही तैयार किए बैठे रत्नेश जी ने बिल आगे बढ़ा दिया,..
"एक सौ अस्सी रुपए!"
उस बुजुर्ग ने बिना कोई ना-नुकुर या टालमटोल किए अपने कुर्ते की जेब से सौ के दो नोट निकालकर रत्नेश जी के सामने काउंटर पर रख दिया।
काउंटर पर से रुपए उठाते हुए रत्नेश जी ने जिज्ञासावश उस बुजुर्ग से पूछ लिया..
"आप यहीं कहीं आस-पास ही रहते हैं क्या अंकल?"
"नहीं बेटा!.मेरा घर यहां से काफी दूर है।"
"फिर भोजन करने आप अक्सर यहां कैसे आ पाते हैं?"
"मैं यहां एक दुकान में मुंशी का काम करता हूंँ!,.और जिस दिन रोटी खाने दोपहर में अपने घर नहीं जा पाता यहां आपके रेस्त्रां में आ जाता हूंँ!.हर रोज जेब में रुपए नहीं होते इसलिए उधार लगा जाता हूंँ,. लेकिन आज तनख्वाह मिली है तो जानबूझकर आ गया।" अपनी बात पूरी करता वह बुजुर्ग मुस्कुराया।
उस बुजुर्ग की उम्र देखते हुए रत्नेश जी खुद को रोक नहीं पाए एक और सवाल पूछ बैठे..
"घर में आपके बच्चे तो होंगे ना?"
"है ना!. बेटा-बहू सब हैं,. फिर भी हाथ-पांव सलामत होते हुए मुफ्त की रोटी खाना अच्छा नहीं लगता लेकिन पहले की तरह मेहनत का काम नहीं कर पाता इसलिए यहां मुंशी के काम पर लग गया हूंँ।"
बुजुर्ग की इमानदारी और कर्मनिष्ठा से प्रभावित रत्नेश जी का मन हुआ कि भोजन के वह रुपए उस बुजुर्ग को वापस कर दें लेकिन कहीं बुजुर्ग के आत्मसम्मान को ठेस ना पहुंचे यह सोच कर रत्नेश जी ने एक सौ अस्सी रुपए का भुगतान लेकर उस बुजुर्ग को बीस रुपए का एक नोट वापस करना चाहा।
लेकिन रेस्तरां में इधर-उधर नजर दौड़ाते हुए उस बुजुर्ग ने वह बीस रुपए का नोट यह कहते हुए लेने से इनकार कर दिया कि,..
"यह बीस रुपए उस कर्मचारी को टिप्स के तौर पर दे दीजिएगा जिसने मुझे हर बार बड़े स्नेह के साथ भोजन परोसा है।"
वह बुजुर्ग वहां से चलने को हुए लेकिन अपने कर्मचारी का उस बुजुर्ग के प्रति नजरिया और उस बुजुर्ग का उस कर्मचारी द्वारा परोसे गए भोजन के प्रति कृतज्ञता देख रत्नेश जी बीस रुपए का नोट अपने हाथ में थामें नि:शब्द हो गए।

Friday, 24 September 2021

हाँ, भगवान है...



 एक मेजर के नेतृत्व में 15 जवानों की एक टुकड़ी हिमालय के अपने रास्ते पर थी

  बेतहाशा ठण्ड में मेजर ने सोचा की अगर उन्हें यहाँ एक कप चाय मिल जाती तो आगे बढ़ने की ताकत आ जाती

 लेकिन रात का समय था आस पास कोई बस्ती भी नहीं थी
 लगभग एक घंटे की चढ़ाई के पश्चात् उन्हें एक जर्जर चाय की दुकान दिखाई दी

लेकिन अफ़सोस उस पर ताला लगा था

भूख और थकान की तीव्रता के चलते जवानों के आग्रह पर मेजर साहब दुकान का ताला तुड़वाने को राज़ी हो गये

 ताला तोडा गया, तो अंदर उन्हें चाय बनाने का सभी सामान मिल गया

  जवानों ने चाय बनाई साथ वहां रखे बिस्किट आदि खाकर खुद को राहत दी  थकान से उबरने के पश्चात् सभी आगे बढ़ने की तैयारी करने लगे लेकिन मेजर साहब को यूँ चोरो की तरह दुकान का ताला तोड़ने के कारण आत्मग्लानि हो रही थी

उन्होंने अपने पर्स में से एक हज़ार का नोट निकाला और चीनी के डब्बे के नीचे दबाकर रख दिया तथा दुकान का शटर ठीक से बंद करवाकर आगे बढ़ गए

 तीन महीने की समाप्ति पर इस टुकड़ी के सभी 15 जवान सकुशल अपने मेजर के नेतृत्व में उसी रास्ते से वापिस आ रहे थे

रास्ते में उसी चाय की दुकान को खुला देखकर वहां विश्राम करने के लिए रुक गए

उस दुकान का "मालिक एक बूढ़ा चाय वाला था"  जो एक साथ इतने ग्राहक देखकर खुश हो गया और उनके लिए चाय बनाने लगा

चाय की चुस्कियों और बिस्कुटों के बीच वो बुजुर्ग चाय वाले से उसके जीवन के  अनुभव पूछने लगे खास्तौर पर
 इतने बीहड़ में दूकान चलाने के बारे में 

 बुजुर्ग व्यक्ति उन्हें कईं कहानियां सुनाता रहा और साथ ही भगवान का आभार प्रकट करता रहा

 तभी एक जवान बोला " बाबा आप भगवान को इतना मानते हो अगर भगवान सच में होता तो फिर उसने तुम्हे इतने बुरे हाल में क्यों रखा हुआ है"

 बाबा बोला  "नहीं साहब ऐसा नहीं कहते भगवान के बारे में,
भगवान् तो है और सच में है .... मैंने देखा है"

 आखरी वाक्य सुनकर सभी जवान कोतुहल से बुजुर्ग की ओर देखने लगे

बाबा बोला "साहब मै बहुत मुसीबत में था एक दिन मेरे इकलौते बेटे को आतंकवादीयों ने पकड़ लिया उन्होंने उसे बहुत मारा पिटा लेकिन उसके पास कोई जानकारी नहीं थी इसलिए उन्होंने उसे मार पीट कर छोड़ दिया"

"मैं दुकान बंद करके उसे हॉस्पिटल ले गया मै बहुत तंगी में था साहब  और आतंकवादियों के डर से किसी ने उधार भी नहीं दिया"

"मेरे पास दवाइयों के पैसे भी नहीं थे और मुझे कोई उम्मीद भी नज़र नहीं आती थी उस रात साहब मै बहुत रोया और मैंने भगवान से प्रार्थना की और मदद मांगी "और साहब ...  उस रात भगवान मेरी दुकान में खुद आए"

"मै सुबह अपनी दुकान पर पहुंचा ताला टूटा देखकर मुझे लगा की मेरे पास जो कुछ भी थोड़ा बहुत था वो भी सब लुट गया"

" मै दुकान में घुसा तो देखा  1000 रूपए का एक नोट, चीनी के डब्बे के नीचे भगवान ने मेरे लिए रखा हुआ है"

"साहब ..... उस दिन एक हज़ार के नोट की कीमत मेरे लिए क्या थी शायद मै बयान न कर पाऊं ...
 लेकिन भगवान् है साहब ... भगवान् तो है"

  बुजुर्ग फिर अपने आप में बड़बड़ाया* 

 भगवान् के होने का आत्मविश्वास उसकी आँखों में साफ़ चमक रहा था

 यह सुनकर वहां सन्नाटा छा गया

 पंद्रह जोड़ी आंखे मेजर की तरफ देख रही थी जिसकी आंख में उन्हें अपने  लिए स्पष्ट आदेश था  "चुप  रहो "

 मेजर साहब उठे, चाय का बिल जमा किया और बूढ़े चाय वाले को गले लगाते हुए बोले "हाँ बाबा मै जानता हूँ भगवान् है.... और तुम्हारी चाय भी शानदार थी"

 और उस दिन उन पंद्रह जोड़ी आँखों ने पहली बार मेजर की आँखों में चमकते पानी के दुर्लभ दृश्य का साक्ष्य किया
  और
    सच्चाई यही है की भगवान तुम्हे कब किसी का भगवान बनाकर कहीं भेज दे ये खुद तुम भी नहीं जानते...........

Wednesday, 22 September 2021

call me

If one day you feel like crying…
call me
I don’t promise that
I will make you laugh

But I can cry with you.

If one day you want to run away
Don’t be afraid to call me.
I don’t promise to ask you to stop,

But I can run with you.

If one day you don’t want to listen to anyone
call me
i promise to be there for you
but i also promise to remain quiet

But…
If one day you call
and there is no answer…
come fast to see me..

Perhaps I need you.

Monday, 20 September 2021

समस्या

एक आदमी के घर में बिल बनाकर एक चूहा रहता था।

एक दिन उस चूहे ने देखा कि वह आदमी और उसकी पत्नी एक थैले से कुछ निकाल रहे हैं।

चूहे ने सोचा कि शायद कुछ खाने का सामान है।

उत्सुकतावश देखने पर उसने पाया कि वो एक चूहेदानी थी।

खतरा भाँपने के बाद उसने घर के ठीक पिछवाड़े में रह रहे एक कबूतर को यह बात बताई कि घर में चूहेदानी आ गई है जिससे सबको ख़तरा है।

कबूतर ने मजाक उड़ाते हुए कहा कि मुझे क्या ? मुझे कौन सा उसमें फँसना है ?

निराश चूहा ये बात नजदीक ही रह रहे एक मुर्गे को बताने गया।

मुर्गे ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा, जा भाई.. ये मेरी समस्या नहीं है...तुम जानो औऱ तुम्हारा काम ।

उसके बाद हताश चूहे ने एक बाड़े में जाकर बकरे को ये बात बताई तो बकरा हँसते-हँसते लोटपोट होने लगा।

सबसे बारी बारी से मिलकर औऱ उनकी बातें सुनकर चूहा बहुत निराश हो गया।

उसी रात चूहेदानी में अचानक खटाक की आवाज हुई, जिसमें एक जहरीला साँप फँस गया था।

अँधेरे में उसकी पूँछ को चूहा समझ कर उस व्यक्ति की पत्नी ने उसे निकालना चाहा तो साँप ने उसे डंस लिया।

पत्नी की तबीयत बिगड़ने पर उस व्यक्ति ने तुरंत हकीम को बुलवाया। 

हकीम ने देखकर उसे कबूतर का सूप पिलाने की सलाह दी।

झट से कबूतर को पकड़ लिया गया औऱ अब वह पतीले में उबल रहा था।

सांप काटने की खबर सुनकर उस व्यक्ति के कई रिश्तेदार उससे मिलने आ पहुँचे जिनके लिए अगले दिन भोजन प्रबंध हेतु उसी मुर्गे की बली दी गई ।

कुछ दिनों बाद उस व्यक्ति की पत्नी बिलकुल ठीक हो गयी, तो खुशी में उस व्यक्ति ने अपने शुभचिंतकों औऱ रिश्तेदारों के लिए एक दावत रखा जिसमें बकरे को काटा गया।

 'चूहा' अब दूर जा चुका था, बहुत दूर.....। 

सीख: -

■ अगली बार यदि कोई आपको अपनी समस्या बताये और आपको लगे कि ये मेरी समस्या नहीं है, तो रुकिए और दुबारा बहुत गंभीरता से सोचिये। अपने सीमित सोच के दायरे से बाहर निकलिये।

Friday, 17 September 2021

माँ की चप्पल

रात के 8 बजे का समय रहा होगा। एक लड़का एक जूतों की दुकान में आता है, गांव का रहने वाला था, पर तेज़ था।

उसका बोलने का लहज़ा गांव वालों की तरह का था, परन्तु बहुत ठहरा हुआ लग रहा था। उम्र लगभग 22 वर्ष का रहा होगा।

दुकानदार की पहली नज़र उसके पैरों पर ही जाती है। उसके पैरों में लेदर के शूज थे, सही से पाॅलिश किये हुये।

दुकानदार "क्या सेवा करूं?"

लड़का "मेरी माँ के लिये चप्पल चाहिये, किंतु टिकाऊ होनी चाहिये!"

दुकानदार "वे आई हैं क्या? उनके पैर का नाप?"

लड़के ने अपना बटुआ बाहर निकाला, चार बार फोल्ड किया हुआ एक कागज़ जिस पर पेन से आऊटलाईन बनाई हुई थी दोनों पैर की!

वह लड़का बोला "क्या नाप बताऊं साहब? मेरी माँ की ज़िन्दगी बीत गई, पैरों में कभी चप्पल नहीं पहनी। माँ मेरी मजदूर है,  मेहनत कर-करके मुझे पढ़ाया, पढ़ कर अब जाके नौकरी लगी।"

आज़ पहली तनख़्वाह मिली है। घर जा रहा हूं, तो सोचा माँ के लिए क्या ले जाऊँ? तो मन में आया कि अपनी पहली तनख़्वाह से माँ के लिये चप्पल लेकर आऊँ!

दुकानदार ने अच्छी टिकाऊ चप्पल दिखाई, जिसकी आठ सौ रुपये कीमत थी। 

"इतनी मंहगी चलेगी क्या?"

आगन्तुक लड़का उस कीमत के लिये तैयार था।

दुकानदार ने सहज ही पूछ लिया "कितनी तनख़्वाह है तेरी?"

"अभी तो बारह हजार, रहना-खाना मिलाकर सात-आठ हजार खर्च हो जाएंगे है यहाँ, और तीन हजार माँ के लिये" 

"अरे, फिर आठ सौ रूपये... कहीं ज्यादा तो नहीं।"

तो बात को बीच में ही काटते हुए लड़का बोला "नहीं, कुछ नहीं होता!"

दुकानदार ने चप्पल बाॅक्स पैक कर दिया। लड़के ने पैसे दिये और ख़ुशी-ख़ुशी दुकान से बाहर निकला।

पर दुकानदार ने उसे कहा "थोड़ा रुको!" 

साथ ही दुकानदार ने एक और बाॅक्स उस लड़के के हाथ में दिया

"यह चप्पल माँ को, तेरे इस भाई की ओर से गिफ्ट। माँ से कहना पहली ख़राब हो जायें तो दूसरी पहन लेना, नँगे पैर नहीं घूमना और इसे लेने से प्लीज मना मत करना!"

दुकानदार ने एकदम से दूसरी मांग करते हुए कहा "उन्हें मेरा प्रणाम कहना, और क्या मुझे एक चीज़ दोगे?"

"बोलिये।"

"वह पेपर, जिस पर तुमने पैरों की आऊटलाईन बनाई थी, वही पेपर मुझे चाहिये!"

वह कागज़, दुकानदार के हाथ में देकर वह लड़का ख़ुशी-ख़ुशी चला गया!

वह फोल्ड वाला कागज़ लेकर दुकानदार ने अपनी दुकान के पूजा घर में रख़ा!

दुकान के पूजाघर में कागज़ को रखते हुये दुकानदार के बच्चों ने देख लिया था और उन्होंने पूछ लिया कि "ये क्या है पापा?"

दुकानदार ने लम्बी साँस लेकर अपने बच्चों से बोला "लक्ष्मीजी के #पग लिये हैं बेटा! एक सच्चे भक्त ने उसे बनाया है, इससे धंधे में बरकत आती है!"

#मां तो इस संसार में साक्षात परमात्मा है! बस हमारी देखने की दृष्टि और मन श्रृद्धापूर्ण होना चाहिये।

सदैव प्रसन्न रहिये!!
जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!

Wednesday, 15 September 2021

फ्रीजर प्लांट

ये कहानी इक ऐसे व्यक्ति की है जो एक फ्रीजर प्लांट में काम करता था ।

वह दिन का अंतिम समय था व् सभी घर जाने को तैयार थे तभी प्लांट में एक तकनीकी समस्या उत्पन्न हो गयी और वह उसे दूर करने में जुट गया ।

जब तक वह कार्य पूरा करता तब तक अत्यधिक देर हो गयी ।
दरवाजे सील हो चुके थे व्
लाईटें बुझा दी गईं ।

*बिना हवा व् प्रकाश के पूरी रात आइस प्लांट में फसें रहने के कारण उसकी बर्फीली कब्रगाह बनना तय था ।*

घण्टे बीत गए तभी उसने
किसी को दरवाजा खोलते पाया ।...
क्या यह इक चमत्कार था ?
सिक्यूरिटी गार्ड टोर्च लिए खड़ा था व् उसने उसे बाहर निकलने में मदद की। वापस आते समय उस
व्यक्ति ने सेक्युर्टी गार्ड से पूछा "आपको कैसे पता चला कि मै भीतर हूँ ?"
गार्ड ने उत्तर दिया "
सर, इस प्लांट में 50 लोग कार्य करते हैँ पर सिर्फ एक आप हैँ
जो सुबह मुझे नमस्कार व् शाम को जाते समय फिर मिलेंगे कहते हैँ ।
आज सुबह आप ड्यूटी पर आये थे पर शाम को आप बाहर नही गए । इससे मुझे शंका हुई और
मैं देखने चला आया ।

व्यक्ति नही जानता था कि उसका किसी को छोटा सा सम्मान
देना कभी उसका जीवन बचाएगा 

याद रखेँ, जब भी आप किसी से मिलते हैं तो उसका गर्मजोश मुस्कुराहट के साथ सम्मान करें । 

हमें नहीं पता पर हो सकता है कि ये आपके जीवन में भी चमत्कार दिखा दे ।

जिन्दगी में दो चीजें कभी 

        मत कीजिए.....

झूठे आदमी के साथ प्रेम
            और 
    सच्चे आदमी के साथ 
            गेम