Wednesday, 21 September 2016

फलवाली

"विचारणीय"

ऑफिस से निकलकर शर्माजी ने

स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि उन्हें याद आया,
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पत्नी ने कहा था, एक दर्ज़न केले लेते आना।
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तभी उन्हें सड़क किनारे बड़े और ताज़ा केले बेचते हुए एक बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया दिख गई।
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वैसे तो वह फल हमेशा "राम आसरे फ्रूट भण्डार" से ही लेते थे, पर आज उन्हें लगा कि क्यों न बुढ़िया से ही खरीद लूँ ?
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उन्होंने बुढ़िया से पूछा, "माई, केले कैसे दिए" ?
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बुढ़िया बोली, बाबूजी बीस रूपये दर्जन,

शर्माजी बोले, माई पँद्रह रुपए दूँगा।
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बुढ़िया ने कहा, अट्ठारह रुपए दे देना,
दो पैसे मैं भी कमा लूँगी।
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शर्मा जी बोले, पँद्रह रुपए लेने हैं तो बोल,

बुझे चेहरे से बुढ़िया ने, "ना" में गर्दन हिला दी।
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शर्माजी बिना कुछ कहे चल पड़े और राम आसरे फ्रूट भण्डार पर आकर
केले का भाव पूछा तो वह बोला 24 रुपए दर्जन हैं
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बाबूजी, कितने दर्जन दूँ ?

शर्माजी बोले, 5 साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ, ठीक भाव लगाओ।
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तो उसने सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा कर दिया।
बोर्ड पर लिखा था- "मोल भाव करने वाले माफ़ करें" ।

शर्माजी को उसका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा। उन्होंने कुछ सोचकर स्कूटर को वापिस मोड़ दिया।
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और सोचते-सोचते वह पुनः बुढ़िया के पास पहुँच गए।

बुढ़िया ने उन्हें पहचान लिया और बोली,
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"बाबूजी केले दे दूँ, पर भाव 18 रूपये से कम नही लगाऊँगी।

शर्माजी ने मुस्कराकर कहा, माई एक  नहीं दो दर्जन दे दो, भाव की चिंता मत करो।
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बुढ़िया का चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा।
वह केले देते हुए बोली, बाबूजी मेरे पास थैली नहीं है ।

फिर बोली, एक टाईम था जब मेरा आदमी जिन्दा था !
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तो मेरी भी छोटी सी दुकान थी।
सब्ज़ी, फल सब बिकता था उस पर।
आदमी की बीमारी में दूकान चली गयी !
आदमी भी नहीं रहा ! अब खाने के भी लाले पड़े हैं !
किसी तरह पेट पाल रही हूँ ! कोई औलाद भी नहीं है ! जिसकी ओर मदद के लिए देखूँ !

इतना कहते-कहते बुढ़िया रुआँसी हो गयी और उसकी आँखों में आँसू आ गए !
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शर्माजी ने 50 रुपये का नोट बुढ़िया को दिया तो वो बोली "बाबूजी मेरे पास छुट्टे नहीं हैं।
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शर्माजी बोले "माई चिंता मत करो, रख लो।
अब मैं तुमसे ही फल खरीदूँगा,
और कल मैं तुम्हें 500 रुपए दूँगा।
धीरे-धीरे चुका देना और
परसों से बेचने के लिए मंडी से दूसरे फल भी ले आना।
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बुढ़िया कुछ कह पाती उसके पहले ही

शर्माजी घर की ओर रवाना हो गए।

घर पहुँचकर उन्होंने पत्नी से कहा,

न जाने क्यों हम हमेशा मुश्किल से

पेट पालने वाले, थड़ी लगाकर सामान बेचने वालों से ही मोल भाव करते हैं और बड़ी दुकानों पर मुँह माँगे पैसे दे आते हैं ! शायद हमारी मानसिकता ही बिगड़ गयी है !
गुणवत्ता के स्थान पर हम चकाचौंध पर अधिक ध्यान देने लगे हैं !
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अगले दिन शर्माजी ने बुढ़िया को 500 ₹ देते हुए कहा, "माई लौटाने की चिंता मत करना। जो फल खरीदूँगा, उनकी कीमत से ही चुक जाएँगे।

जब शर्माजी ने ऑफिस में यह किस्सा बताया तो सबने बुढ़िया से ही फल खरीदना प्रारम्भ कर दिया।
तीन महीने बाद ऑफिस के लोगों ने स्टाफ-क्लब की ओर से बुढ़िया को एक हाथ ठेला भी भेंट कर दिया।

बुढ़िया अब बहुत खुश थी। उचित खान-पान के कारण उसका स्वास्थ्य भी पहले से बहुत अच्छा हो गया ।

अब वह हर दिन शर्माजी और ऑफिस के दूसरे लोगों को दुआ देती नहीं थकती थी।
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शर्माजी के मन में भी अपनी "बदली सोच" और "एक असहाय निर्बल महिला की सहायता करने की संतुष्टि" का भाव रहता है...।

दोस्तों, जीवन में किसी बेसहारा की मदद करके देखो,
अपनी पूरी जिंदगी में किए गए सभी कार्यों से ज्यादा संतोष मिलेगा...!!
करके देखें ।
           😊😊😊

नोट: - लेख वाक़ई अच्छा है। अवश्य शेयर करें ।
सोच बदलने के साथ ही जिंदगी जीने का नजरिया बदल जाता है ।
           😇😇😇

Monday, 19 September 2016

एहसान

👉 एहसान

🔴 एक बहेलिया था। एक बार जंगल में उसने चिड़िया फंसाने के लिए अपना जाल फैलाया। थोड़ी देर बाद ही एक उकाब उसके जाल में फंस गया।

🔵 वह उसे घर लाया और उसके पंख काट दिए। अब उकाब उड़ नहीं सकता था, बस उछल उछलकर घर के आस-पास ही घूमता रहता।

🔴 उस बहेलिए के घर के पास ही एक शिकारी रहता था। उकाब की यह हालत देखकर उससे सहन नहीं हुआ। वह बहेलिए के पास गया और कहा- ”मित्र, जहां तक मुझे मालूम है, तुम्हारे पास एक उकाब है, जिसके तुमने पंख काट दिए हैं। उकाब तो शिकारी पक्षी है। छोटे-छोटे जानवर खा कर अपना भरण-पोषण करता है। इसके लिए उसका उड़ना जरूरी है। मगर उसके पंख काटकर तुमने उसे अपंग बना दिया है। फिर भी क्या तुम उसे मुझे बेच दोगे?

🔵 बहेलिए के लिए उकाब कोई काम का पक्षी तो था नहीं, अतः उसने उस शिकारी की बात मान ली और कुछ पैसों के बदले उकाब उसे दे दिया।

🔴 शिकारी उकाब को अपने घर ले आया और उसकी दवा-दारू करने लगा। दो माह में उकाब के नए पंख निकल आए। वे पहले जैसे ही बड़े थे। अब वह उड़ सकता था।

🔵 जब शिकारी को यह बात समझ में आ गई तो उसने उकाब को खुले आकाश में छोड़ दिया। उकाब ऊंचे आकाश में उड़ गया। शिकारी यह सब देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। उकाब भी बहुत प्रसन्न था और शिकारी का बहुत कृतज्ञ था।

🔴 अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उकाब एक खरगोश मारकर शिकारी के पास लाया।

🔵 एक लोमड़ी, जो यह सब देख रही थी, उकाब से बोली- ”मित्र! जो तुम्हें हानि नहीं पहुंचा सकता उसे प्रसन्न करने से क्या लाभ?“

🔴 इसके उत्तर में उकाब ने कहा- ”व्यक्ति को हर उस व्यक्ति का एहसान मानना चाहिए, जिसने उसकी सहायता की हो और ऐेसे व्यक्तियों से सावधान रहना चाहिए जो हानि पहुंचा सकते हों।“

🔵 निष्कर्ष- व्यक्ति को सदा सहायता करने वाले का कृतज्ञ रहना चाहिए।

Sunday, 18 September 2016

कविता : डॉ. हरिओम पंवार

केसर घाटी में आतंकी शोर सुनाई देता है..
हिजबुल लश्कर के नारों का जोर सुनाई देता है....
मलय समीरा मौसम आदमखोर दिखायी देता है.... 
लालकिले का भाषण भी कमजोर दिखायी देता है.... 
भारत गाँधी गौतम का आलोक था...
कलिंग विजय से ऊबा हुआ अशोक था...
अब ये जलते हुए पहाड़ों का घर है...
बारूदी आकाश हमारे सर पर है...
इन कोहराम भरी रातों का ढ़लना बहुत जरुरी है.... 
घोर तिमिर में शब्द-ज्योति का जलना बहुत जरुरी है....
मैं युगबोधी कलमकार का धरम नहीं बिकने दूंगा....
चाहे मेरा सर कट जाये कलम नहीं बिकने दूंगा....
इसीलिए केवल अंगार लिए फिरता हूँ वाणी में....
आंसू से भीगा अखबार लिए फिरता हूँ वाणी में....


ये जो भी आतंकों से समझौते की लाचारी है....
ये दरबारी कायरता है आपराधिक गद्दारी है....
ये बाघों का शरण-पत्र है भेड़, शियारों के आगे....
वटवृक्षों का शीश नमन है खरपतवारों के आगे.....
हमने डाकू तस्कर आत्मसमर्पण करते देखे थे.....
सत्ता के आगे बंदूकें अर्पण करते देखे थे....
लेकिन अब तो सिंहासन का आत्मसमर्पण देख लिया....
अपने अवतारों के बौने कद का दर्पण देख लिया....
जैसे कोई ताल तलैया गंगा-यमुना को डांटे एक तमंचा मार रहा है... 
एटम के मुँह पर चाटें जैसे एक समन्दर गागर से चुल्लू भर जल मांगे ऐसे घुटने टेक रहा है...

सूरज जुगनू के आगे ये कैसा परिवर्तन है खुद्दारी के आचरणों में....
संसद का सम्मान पड़ा है चरमपंथ के चरणों में.... 
किसका खून नहीं खोलेगा पढ़-सुनकर अखबारों में....
सिंहों की पेशी करवा दी चूहों के दरबारों में....
हिजबुल देश नहीं हत्यारी टोली है....
साजिश के षड्यंत्रों की हमजोली है....
जब तक इनका काम तमाम नहीं होता....
उग्रवाद से युद्धविराम नहीं होता दृढ़ संकल्पों की पतवार लिये फिरता हूँ....
वाणी में चंदरबरदायी ललकार लिये फिरता हूँ....
वाणी में इसीलिए केवल अंगार लिये फिरता हूँ....

वाणी में जो घाटी में खड़े हुयें हैं हत्यारों की टोली में....
खूनी छींटे छिड़क रहे हैं आँगन द्वार रंगोली में....
जो पैरों से रौंद रहे हैं भारत की तस्वीरों को....
गाली देते हैं ग़ालिब को तुलसी, मीर, कबीरों को.....
उनके पैरों बेड़ी जकड़ी जाना शेष अभी भी है.....
उनके फन पर ऐड़ी - रगड़ी जाना शेष अभी भी है.....
जिन लोगों ने गोद लिया है जिन्ना की परिपाटी को.....
दुनिया में बदनाम किया है पूजित पावन माटी को ....
जिन लोगों ने कभी तिरंगे का सम्मान नहीं सीखा....
अपनी जननी जन्मभूमि का गौरवगान नहीं सीखा.....
जिनके कारण अपहरणों की स्वर्णमयी आजादी है....
रोज गौडसे की गोली के आगे कोई गाँधी है....
जिन लोगों का पाप खुदा भी माफ़ नहीं कर सकते हैं....
जिनका दामन सात समन्दर साफ़ नहीं कर सकते हैं....
जो दुश्मन के हित के पहरेदार बताएं जाते हैं....
जो सौ - सौ लाशों के जिम्मेदार बताये जाते हैं....
जो भारत के गुनाहगार हैं फांसी के अधिकारी हैं.... 
आज उन्हीं से शांतिवार्ता करने की तयारी है....
जिन लोगों ने संविधान पर थूका है....
और हिन्द का अमर तिरंगा फूंका है....
दिल्ली उनसे हाथ मिलाने वाली है....
ये भारत के स्वाभिमान को गाली है....
इस लाचारी को धिक्कार लिये फिरता हूँ....
वाणी में तीखे शब्दों की तलवार लिये फिरता हूँ..... 
वाणी में इसीलिए केवल अंगार लिये फिरता हूँ.....

हर संकट का हल मत पूछो, आसमान के तारों से.... 
सूरज किरणें नहीं मांगता नभ के चाँद-सितारों से.....
सत्य कलम की शक्ति पीठ है राजधर्म पर बोलेगी....
वर्तमान के अपराधों को समयतुला पर तोलेगी.....
पांचाली के चीर हरण पर जो चुप पाए जायेंगे....
इतिहासों के पन्नों में वे सब कायर कहलायेंगे.. 
बंदूकों की गोली का उत्तर सद्भाव नहीं होता....
हत्यारों के लिए अहिंसा का प्रस्ताव नहीं होता....
ये युद्धों का परम सत्य है सारा जगत जानता है..... 
लोहा और लहू जब लड़ते हैं तो लहू हारता है....
जो खूनी दंशों को सहने वाला राजवंश होगा....
या तो परम मूर्ख होगा या कोई परमहंस होगा....
आतंकों से लड़ने के संकल्प कड़े करने होंगे.....
हत्यारे हाथों से अपने हाथ बड़े करने होंगे....
कोई विषधर कभी शांति के बीज नहीं बो सकता है.....
एक भेडिया शाकाहारी कभी नहीं हो सकता है.....
हमने बावन साल खो दिए श्वेत कपोत उड़ाने में..... 
खूनी पंजों के गिद्धों को गायत्री समझाने में....
एक बार बस एक बार इन अभियानों को झटका दो....
लाल चौक में देशद्रोहियों को सूली पर लटका दो.....
हर समझौता चक्रव्यूह बन जाता है....
बार-बार अभिमन्यु मारा जाता है....
अब दिल्ली सेना के हाथ नहीं बांधे...
अर्जुन से बोलो गांडीव धनुष साधे...
घायल घाटी का उपचार लिए फिरता हूँ वाणी में बोस-पटेलों की दरकार लिए फिरता हूँ वाणी में इसीलिए केवल अंगार लिए फिरता हूँ वाणी में


शिव-शंकर जी की धरती ने कितना दर्द सहा होगा... 
जब भोले बाबा के भक्तों का भी खून बहा होगा...
दिल दहलाती हैं करतूतें रक्षा करने वालों की....
आँखों में आंसू लाती हैं हालत मरने वालों की....
काश्मीर के राजभवन से आज भरोसे टूट लिये....
लाशों के चूड़ी कंगन भी पुलिसबलों ने लूट लिये..... 
ये जो ऑटोनोमी वाला राग अलापा जाता है....
गैरों के घर भारत माँ का दामन नापा जाता है....
ये जो कागज के शेरों की तरह दहाडा जाता है....
गड़े हुए मुर्दों को बारम्बार उखाड़ा जाता है....
इस नौटंकी का परदा हट जाना बहुत लाजमी है..... 
जाफर जयचंदों का सर कट जाना बहुत लाजमी है.....
कोई सपना ना देखे हम देश बाँट कर दे देंगे...
हाथ कटाए बैठे हैं अब शीश काटकर दे देंगे....
शेष बचा कश्मीर हमारे श्रीकृष्ण की गीता है.... सैंतालिस में चोरी जाने वाली पावन सीता है....
अगर राम का सीता को वापस पाना मजबूरी है....
तो पाकिस्तानी रावण का मरना बहुत जरुरी है...... 
धरती-अम्बर और समन्दर से कह दो....
दुनिया के हर पञ्च सिकन्दर से कह दो....
कोई अपना खुदा नहीं हो सकता है....
काश्मीर अब जुदा नहीं हो सकता है....
अपना कश्मीरी अधिकार लिए फिरता हूँ वाणी में 
अपनी भारत माँ का प्यार लिए फिरता हूँ वाणी में इसीलिए केवल अंगार लिए फिरता हूँ वाणी में

--डॉ हरिओम पंवार

Tuesday, 6 September 2016

सब्जी वाला

लड़का और लड़की की शादी तो हो चुकी थी, पर दोनों में बन नहीं रही थी। पंडित ने कुंडली के 36 गुण मिला कर शादी का नारियल फोड़वाया था, पर शादी के साल भर बाद ही चिकचिक शुरू हो गई थी।

पत्नी अपने ससुराल वालों के उन अवगुणों का भी पोस्टमार्टम कर लेती, जिन्हें कोई और देख ही नहीं पाता था।
लगता था कि अब तलाक, तो तब तलाक। पूरा घर तबाह होता नज़र आ रहा था।
सबने कोशिश कर ली कि किसी तरह यह रिश्ता बच जाए, दो परिवार तबाही के दंश से बच जाएं, पर सारी कोशिशें व्यर्थ थीं।

जो भी घर आता, पत्नी अपने पति की ढेरों खामियां गिनाती और कहती कि उसके साथ रहना असम्भव है। वो कहती कि इसके साथ तो एक मिनट भी नहीं रहा जा सकता। दो बच्चे हो चुके हैं और बच्चों की खातिर किसी तरह ज़िंदगी कट रही है।
उनके कटु रिश्तों की यह कहानी पूरे मुहल्ले में चर्चा का विषय बनी हुई थी।

ऐसे में एक दिन एक आदमी सब्जी बेचता हुआ उनके घर आ पहुंचा। उस दिन घर में सब्जी नहीं थी।
“ऐ सब्जी वाले, तुम्हारे पास क्या-क्या सब्जियां हैं?”
“बहन, मेरे पास आलू, बैंगन, टमाटर, भिंडी और गोभी है।”
“जरा दिखाओ तो सब्जियां कैसी हैं?
सब्जी वाले ने सब्जी की टोकरी नीचे रखी। महिला टमाटर देखने लगी।
सब्जी वाले ने कहा, “बहन आप टमाटर मत लो। इस टोकरी में जो टमाटर हैं, उनमें दो चार खराब हो चुके हैं। आप आलू ले लो।”
“अरे, चाहिए टमाटर तो आलू क्यों ले लूं? तुम टमाटर इधर लाओ, मैं उनमें से जो ठीक हैं उन्हें छांट लूंगी।”

सब्जी वाले ने टमाटर आगे कर दिए।
महिला खराब टमाटरों को किनारे करने लगी और अच्छे टमाटर उठाने लगी। दो किलो टमाटर हो गया।
फिर उसने भिंडी उठाई।
सब्जी वाला फिर बोला, “बहन, भिंडी भी आपके काम की नहीं। इसमें भी कुछ भिंडी खराब हैं। आप आलू ले लीजिए। वो ठीक हैं।”

“बड़े कमाल के सब्जी वाले हो तुम। तुम बार-बार कह रहे हो आलू ले लो, आलू ले लो। भिंडी, टमाटर किसके लिए हैं?  मेरे लिए नहीं है क्या?”

“मैं सारी सब्जियां बेचता हूं। पर बहन, आपको टमाटर और भिंडी ही चाहिए, मुझे पता है कि मेरी टोकरी में कुछ टमाटर और कुछ भिंडी खराब हैं, इसीलिए मैंने आपको मना किया। और कोई बात नहीं।”

“पर मैं तो अपने हिसाब से अच्छे टमाटर और भिंडियां छांट सकती हूं। जो ख़राब हैं, उन्हें छोड़ दूंगी। मुझे अच्छी सब्जियों की पहचान है।”

“बहुत खूब बहन। आप अच्छे टमाटर चुनना जानती हैं। अच्छी भिंडियां चुनना भी जानती हैं। आपने ख़राब टमाटरों को किनारे कर दिया। ख़राब भिंडियां भी छांट कर हटा दीं। पर आप अपने रिश्तों में एक अच्छाई नहीं ढूंढ पा रहीं। आपको उनमें सिर्फ बुराइयां ही बुराइयां नज़र आती हैं।

बहन, जैसे आपने टमाटर छांट लिए, भिंडी छांट ली, वैसे ही रिश्तों से अच्छाई को छांटना सीखिए। जैसे मेरी टोकरी में कुछ टमाटर ख़राब थे, कुछ भिंडी खराब थीं पर आपने अपने काम लायक छांट लिए, वैसे ही हर आदमी में कुछ न कुछ अच्छाई होती है। उन्हें छांटना आता, तो आज मुहल्ले भर में आपके ख़राब रिश्तों की चर्चा न चल रही होती।”
***
सब्जी वाला तो चला गया.. पर उस दिन महिला ने रिश्तों को परखने की विद्या सीख ली थी।
***
उस शाम घर में बहुत अच्छी सब्जी बनी। सबने खाई और कहा, बहू हो तो ऐसी हो।