Monday, 20 November 2017

बंद मुट्ठी

सप्रे जी बिजली के बिल भरने की लाईन में लगे हुए थे। तभी करीब 80 साल अम्मा जिनकी कमर 45 डिग्री से भी ज्यादा पर झुकी थी धीरे-धीरे चलते हुए उनके पीछे आकर खड़ी हो गई। एक हाथ में कुछ नोट और दूसरे कांपते हाथ में बिल लिए वह हांफ रही थी। सप्रे जी ने उसकी हालत देख अपने आगे लाईन में लगने को बोला पर वह इतनी थकी थी कि उसके मुख से कोई बोल नहीं निकल पाए।

सप्रे जी ने भी अपना बिल भरा और बाहर आकर गाड़ी की तरफ बढ़ गए। अभी उन्होंने गाड़ी बढ़ाई ही थी कि वह अम्मा उन्हें फिर धीरे-धीरे जाते दिखाई दी। कड़कडाती धूप में पहले से ज्यादा झुकी अम्मा को देख  गाड़ी रोक पूछा – अम्मा किधर जाना है... बैठो छोड़ देता हूँ? बेटा 10 नम्बर स्टॉप जाना है। सप्रे जी को उसकी बताई दिशा से उल्टी तरफ जाना था पर उनकी हालात देख छोड़ने चल दिए। अम्मा जी के मुख से इतनी देर में बहुत सारी दुआएँ निकलने लगी।

सप्रे जी ने पूछा अम्मा बिल भरने आपको आना पड़ा, घर में कोई नहीं है क्या?  बोली एक बेटा है न, काम पर गया है। 15 दिन बाद तो उसे आज काम मिला। घर में पैसे नहीं थे और आज बिल भरने का आखरी दिन था। बहु नई आई है उसे कुछ पता नहीं, एक घर में काम मिला है वहां गई है। पड़ौसी से 170 रु. उधार लेकर सुबह आठ बजे से निकली हूँ और अब पहूँची। नहीं आती तो बिजली कट जाती। बूढ़ी हूं.. पैसा नहीं था न बस के लिए। बेटा काम न मिलना बड़ी परेशानी है और गरीबी सबसे बड़ी।

सप्रे जी भी अम्मा की बात सुन भावुक हो गए और विचलित भी। सप्रे जी ने एक हाथ से स्टेरिंग संभाला और दूसरा हाथ आगे वाली जेब में डाला। 100 के 2-3 नोट हाथ में आ गए। अम्मा जी की तरफ बढ़ा कर बोले – ये रख लो अम्मा। ना-बेटा-ना पैसे नहीं लूँगी। बड़े भले हो, भगवान कृपा करे तुम पर। मुझ अनजान बूढ़ी को घर छोड़ने जा रहे हो यही बड़ी कृपा है तुम्हारी।
रख लो अम्मा बहुत नहीं है पर कुछ तो काम आएँगे। पैसे रखे ना रखे के भाव के बीच डौलती अम्मा का स्वाभिमानी सर ना की मुद्रा में ही घूम रहा था।

अब बताओ अम्मा 10 नं. आ गया। कहाँ उतार दूँ?

ज्यादा परेशान न करने के संकोच में बोली गली के आखिर में है बेटा, पर तुम तो यहीं छोड़ दो, धीरे-धीरे चली जाउंगी।

पूछा गली में चली जाती है क्या घर तक गाड़ी? बोली – हाँ।

सप्रे जी ने गाड़ी गली में डाल कर अम्मा जी के घर के सामने रोक दी। बाहर आकर अम्मा जी को उतारा। वह उतरते-उतरते बार-बार दुआएँ देती बोल रही थी तुम जैसे भले लोग बचे है अभी दुनिया में।

सप्रे जी ने फिर जेब से नोट निकाल अम्मा जी की हथेलियों पर जबरदस्ती रख दिए। अब की बार अम्मा जी ने उन्हें बहुत जोर से भींच लिया।

अम्मा की आंखों में आंसू थे पर मुट्ठी की पकड़ में मजबूती।

बंद मुट्ठी में स्वाभिमान की पकड़ से जरूरत की पकड़ ज्यादा मजबूत थी।

- सुनील अवसरकर