Monday, 23 November 2015

हीरा

एक आदमी ने भगवान बुद्ध  से पुछा : जीवन का मूल्य क्या है?

बुद्ध  ने उसे एक Stone दिया
और कहा : जा और इस stone का
मूल्य पता करके आ , लेकिन ध्यान
रखना stone को बेचना नही है I

वह आदमी stone को बाजार मे एक संतरे वाले के पास लेकर गया और बोला : इसकी कीमत क्या है?

संतरे वाला चमकीले stone को देख
कर बोला, "12 संतरे लेजा और इसे
मुझे दे जा"

आगे एक सब्जी वाले ने उस चमकीले stone को देखा और कहा
"एक बोरी आलू ले जा और
इस stone को मेरे पास छोड़ जा"

आगे एक सोना बेचने वाले के
पास गया उसे stone दिखाया सुनार
उस चमकीले stone को देखकर बोला,  "50 लाख मे बेच दे" l

उसने मना कर दिया तो सुनार बोला "2 करोड़ मे दे दे या बता इसकी कीमत जो माँगेगा वह दूँगा तुझे..

उस आदमी ने सुनार से कहा मेरे गुरू
ने इसे बेचने से मना किया है l

आगे हीरे बेचने वाले एक जौहरी के पास गया उसे stone दिखाया l

जौहरी ने जब उस बेसकीमती रुबी को देखा , तो पहले उसने रुबी के पास एक लाल कपडा बिछाया फिर उस बेसकीमती रुबी की परिक्रमा लगाई माथा टेका l

फिर जौहरी बोला , "कहा से लाया है ये बेसकीमती रुबी? सारी कायनात , सारी दुनिया को बेचकर भी इसकी कीमत नही लगाई जा सकती
ये तो बेसकीमती है l"

वह आदमी हैरान परेशान होकर सीधे बुद्ध  के पास आया l

अपनी आप बिती बताई और बोला
"अब बताओ भगवान ,
मानवीय जीवन का मूल्य क्या है?

बुद्ध  बोले :

संतरे वाले को दिखाया उसने इसकी कीमत "12 संतरे" की बताई l

सब्जी वाले के पास गया उसने
इसकी कीमत "1 बोरी आलू" बताई l

आगे सुनार ने "2 करोड़" बताई l
और
जौहरी ने इसे "बेसकीमती" बताया l

अब ऐसा ही मानवीय मूल्य का भी है l

तू बेशक हीरा है..!!
लेकिन,
सामने वाला तेरी कीमत,
अपनी औकात - अपनी जानकारी -  अपनी हैसियत से लगाएगा।

घबराओ मत दुनिया में..
तुझे पहचानने वाले भी मिल जायेगे।

Friday, 6 November 2015

ध्रुव चरित्र


मनु शतरूपा के एक पुत्र उत्तानपाद हुए । राजा उत्तानपाद की सुरुचि और सुनीति नाम की दो रानियां थीं । सुरुचि के पुत्र का नाम उत्तम था । सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव था । राजा उत्तानपाद रानी सुरुचि को बहुत चाहते थे । राजा उत्तानपाद रानी सुरुचि को घर के अंदर रखते और रानी सुनीति को घर के बाहर रखते थे । एक बार राजा और रानी सुरुचि राज दरबार में बैठे थे और राज कुमार उत्तम राजा की गोदी में बैठे थे ।

इतने में राजकुमार ध्रुव कहीं से खेलते हुए आए और राजा की गोदी में बैठने गए । इस बात पर रानी सुरुचि बहुत नाराज हो गयीं और ध्रुव जी का हैथ पकड़ कर गोदी से नीचे उतार कर बोलीं कि तुम अगर राजा की गोद पर बैठना चाहते हो तो तुम्हें मेरे कोख से जन्म लेना पड़ेगा । बालक ध्रुव रोते हुए अपनी मां के पास गए और उन्हें सब बात बताई । सुनीति ने प्रार्थना करो । ध्रुव जी घर से मां के कथनानुसार जंगल में तपस्या करने चले गए । नारद जी ने ध्रुव जी को भगवत् प्राप्ति का मार्ग बताया । बहुत समय तक तपस्या करने के बाद ध्रुव जी को भगवान के दर्शन हुए और एक अटल पद (ध्रुवतारा) की प्राप्ति हुई ।

इस प्रकरण में राजा उत्तानपाद जीवात्मा का रूप हैं जिनका शाखाएं जमीन के नीचे और मस्तिष्क ऊपर की तरफ होता है । सुरुचि = प्रिय (स्वरूचि) मन के अनुरुप, विषयासक्ति व अविवेक जो अपनी रुचि के अनुसार बात करें । प्रत्येक व्यक्ति सुरुचि को अपने साथ यानी कि घर के अंदर रखता है ।
सुनीति = श्रेय, जीवन का कल्याण, सुंदर नीति । हर व्यक्ति नीति की बात दूसरों को शिक्षा देने के लिए ही करता है ।
"पर उपदेश कुशल बहुतेरे" ।

इसलिए राजा भी सुनीति को घर के बाहर रखते थे । नीति के मार्ग पर चलकर ही अटल सत्य (ध्रुव) की प्राप्ति होती है । सुनीति की सुंदर शिक्षा के कारण ध्रुव जी भगवान के साक्षात् दर्शन कर पाए । जननी वहीं है जो अपने पुत्र को भगवान के प्रेम की ओर मोड़ दे (न कि अपनी ममता की ओर मोड़े) सुनीति जननी है । मानस में सुमित्रा जननी हुई । अपनी ममता के बंधन को तोड़कर प्रभु से प्रेम करा दे, वहीं जननी है । "भक्ति संस्कारान् जनयति सा जननी" । यदि संतान पैदा करने मात्र से मां को जननी कहा जाता तो गाय और बकरी भी जननी कहलाती । जीवन सहज एवं स्वाभाविक होना चाहिए । बनाने और सजाने मात्र से प्रभु नहीं मिलते ।

Thursday, 5 November 2015

आम और लीची

दो किसान थे एक ने आम उगाए थे तो दूसरे ने लीची।
अपने-अपने फल बाजार में बेचने के बाद उन दोनों ने अपने लिए पांच-पांच किलो फल बचा लिए थे।
वापस लौटते समय दोनों रास्ते में मिले। दोनों में बात होने लगी।
आम वाला किसान बोला - मैंने फल बचा तो लिए, लेकिन इस बार खूब फसल हुई, हम लोगों ने खूब आम खाए।
अब खाने का बिल्कुल भी मन नहीं है।
लीची वाले किसान ने कहा - यही हाल मेरा भी रहा।
दोनों ने यह फैसला किया कि दोनों आपस में फल बदल लेते हैं।
आम वाले ने लीची ले लीं और लीची वाले किसान ने आम।
लेकिन आम वाला किसान बहुत लालची था।
उसने नजर बचाकर कुछ आम बचाकर रख लिए।
लीची वाला किसान आम पाकर बहुत खुश हुआ।
घर जाकर उसने पूरे परिवार को आम खिलाए और उसे बड़ी अच्छी नींद आई।
लेकिन आम वाला किसान बहुत व्यथित रहा उसे रात भर नींद नहीं आ सकी।
उसे आत्मग्लानि नहीं हो रही थी, बल्कि उसे यह लग रहा था कि कहीं उसकी तरह लीची वाले किसान ने भी कुछ लीचियां छुपाकर तो नहीं रख ली हैं।

इस छोटी सी कथा मर्म यह है की गलत काम करने वाले को दूसरा व्यक्ति भी गलत ही नजर आता है।
इसी संशय से उसे दुख मिलता है।