Friday, 3 December 2021

निर्भर

एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई।

शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। 

वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। 

दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई।

 वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था। उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे।

वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों भी करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फस गए। दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था। 

थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है? 

बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं। 

गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है? 

उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है।

गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा?

थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया। 

जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।

गाय समर्पित ह्रदय का प्रतीक है। बाघ अहंकारी मन है और मालिक ईश्वर का प्रतीक है। कीचड़ यह संसार है। और यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है।

किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है लेकिन उसकी अति नहीं होनी चाहिए। आपको किसी मित्र, किसी गुरु, किसी सहयोगी की हमेशा ही जरूरत होती है।

संवेदनशीलता

एक छोटी सी कहानी...
        एक पोस्टमैन ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा,
          "चिट्ठी ले लीजिये।"
      अंदर से एक बालिका की आवाज आई,
    "आ रही हूँ।"
         लेकिन तीन-चार मिनट तक कोई न आया तो पोस्टमैन ने फिर कहा,
        "अरे भाई! मकान में कोई है क्या, अपनी चिट्ठी ले लो।"
      लड़की की फिर आवाज आई,"पोस्टमैन साहब, दरवाजे के नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए,मैं आ रही हूँ।          "पोस्टमैन ने कहा,"नहीं,मैं खड़ा हूँ,रजिस्टर्ड चिट्ठी है,पावती पर तुम्हारे साइन चाहिये।"
        करीबन छह-सात मिनट बाद दरवाजा खुला। पोस्टमैन इस देरी के लिए  झल्लाया हुआ तो था ही और उस पर चिल्लाने वाला था ही लेकिन, दरवाजा खुलते ही वह चौंक गया !! सामने एक अपाहिज कन्या जिसके पांव नहीं थे, सामने खड़ी थी। 
        पोस्टमैन चुपचाप पत्र देकर और उसके साइन लेकर चला गया। हफ़्ते,दो हफ़्ते में जब कभी उस लड़की के लिए डाक आती, पोस्टमैन एक आवाज देता और जब तक वह कन्या न आती तब तक खड़ा रहता। एक दिन लड़की ने पोस्टमैन को नंगे पाँव देखा।
          दीपावली नजदीक आ रही थी। उसने सोचा पोस्टमैन को क्या ईनाम दूँ।
          एक दिन जब पोस्टमैन डाक देकर चला गया, तब उस लड़की ने,जहां मिट्टी में पोस्टमैन के पाँव के निशान बने थे,उन पर काग़ज़ रख कर उन पाँवों का चित्र उतार लिया।
            अगले दिन उसने अपने यहाँ काम करने वाली बाई से उस नाप के जूते मंगवा लिये। 
          दीपावली आई और उसके अगले दिन पोस्टमैन ने गली के सब लोगों से तो ईनाम माँगा और सोचा कि अब इस बिटिया से क्या इनाम लेना? पर गली में आया हूँ तो उससे मिल ही लूँ। 
        उसने दरवाजा खटखटाया। 
       अंदर से आवाज आई,
         "कौन?
        "पोस्टमैन, उत्तर मिला।
           बालिका हाथ में एक गिफ्ट पैक लेकर आई और कहा, "अंकल,मेरी तरफ से दीपावली पर आपको यह भेंट है।
          "पोस्टमैन ने कहा," तुम तो मेरे लिए बेटी के समान हो,
       तुमसे मैं गिफ्ट कैसे लूँ ? "कन्या ने आग्रह किया कि मेरी इस गिफ्ट के लिए मना नहीं करें।
         "ठीक है कहते हुए पोस्टमैन ने पैकेट ले लिया। बालिका ने कहा, "अंकल इस पैकेट को घर ले जाकर खोलना"।
           घर जाकर जब उसने पैकेट खोला तो विस्मित रह गया, क्योंकि उसमें एक जोड़ी जूते थे। उसकी आँखें भर आईं।
        अगले दिन वह ऑफिस पहुंचा और पोस्टमास्टर से अनुरोध किया कि उसका तबादला फ़ौरन कर दिया जाए। 

            पोस्टमास्टर ने कारण पूछा, तो पोस्टमैन ने वे जूते टेबल पर रखते हुए सारी कहानी सुनाई और भीगी आँखों और रुंधे कंठ से कहा, "आज के बाद मैं उस गली में नहीं जा सकूँगा। उस अपाहिज बच्ची ने तो मेरे नंगे पाँवों को तो जूते दे दिये पर मैं उसे पाँव कैसे दे पाऊँगा?"

        संवेदनशीलता का यह श्रेष्ठ दृष्टांत है। संवेदनशीलता यानि,दूसरों के दुःख-दर्द को समझना,अनुभव करना और उसके दुःख-दर्द में भागीदारी करना,उसमें शरीक होना। यह ऐसा मानवीय गुण है जिसके बिना इंसान अधूरा है।

           ईश्वर से प्रार्थना है कि वह हमें संवेदनशीलता रूपी आभूषण प्रदान करें ताकि हम दूसरों के दुःख-दर्द को कम करने में योगदान कर सकें।संकट की घड़ी में कोई यह नहीं समझे कि वह अकेला है,अपितु उसे महसूस हो कि सारी मानवता उसके साथ है।
 

Tuesday, 28 September 2021

निर्भर

एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई।

शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। 

वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। 

दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई।

 वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था। उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे।

वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों भी करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फस गए। दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था। 

थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है? 

बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं। 

गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है? 

उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है।

गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा?

थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया। 

जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।

गाय समर्पित ह्रदय का प्रतीक है। बाघ अहंकारी मन है और मालिक ईश्वर का प्रतीक है। कीचड़ यह संसार है। और यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है।

किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है लेकिन उसकी अति नहीं होनी चाहिए। आपको किसी मित्र, किसी गुरु, किसी सहयोगी की हमेशा ही जरूरत होती है।

Sunday, 26 September 2021

उधार

"सर!.वह जो सबसे पीछे वाली मेज पर बुजुर्ग बैठे हैं ना,. वह वही है जो यहां पहले भी दो बार उधार खाना खाकर चले गए थे।"
उस रेस्त्रां के स्टाफ ने आकर धीरे से उस रेस्त्रां के मालिक रत्नेश जी के कान में यह बात बताया,.
"उनका आज का आर्डर कितने का है?"
रत्नेश जी ने अपने उस कर्मचारी से जानना चाहा।
"सर!.आर्डर तो वह कभी ज्यादा का नहीं करते हर बार की तरह आज भी साठ रुपए का ही ऑर्डर है,.तड़के वाली दाल के साथ दो रोटी।"
उस बुजुर्ग का साधारण सा भोजन का आर्डर सुनकर रत्नेश जी सोचने लगे..
"जरूर इनकी कोई मजबूरी रही होगी इसलिए पैसे नहीं चुका पाए होंगे।"
"नहीं सर!.ऐसे लोगों को मुफ्त की खाने की आदत होती है इसलिए पैसे नहीं चुकाते और ऐसे ही उधार रहा कह कर टालते रहते हैं।"
रेस्त्रां के उस कर्मचारी ने हिकारत भरी निगाहों से उस ओर देखा लेकिन रत्नेश जी ने अपने कर्मचारी की सोच को दरकिनार कर सबसे पिछली मेज पर बैठे उस बुजुर्ग को गौर से देखा..
"ठीक है!.तुम जाओ मैं देखता हूंँ।"
रत्नेश जी ने गौर किया कि साधारण वेशभूषा वाले उस बुजुर्ग के चेहरे पर उम्र की थकान साफ झलक रही थी। साधारण सा कुर्ता-पायजामा पहने अपने कंधे पर गमछा रखे वह बुजुर्ग किसी बहुत ही साधारण परिवेश में रचा-बसा मालूम पड़ रहा था।
खैर भोजन समाप्त कर वह बुजुर्ग सीधा रेस्त्रां के काउंटर पर रत्नेश जी के करीब आया..
"मेरा बिल कितने का हुआ?"
भोजन का वर्तमान और पिछले उधार के भुगतान की रसीद पहले से ही तैयार किए बैठे रत्नेश जी ने बिल आगे बढ़ा दिया,..
"एक सौ अस्सी रुपए!"
उस बुजुर्ग ने बिना कोई ना-नुकुर या टालमटोल किए अपने कुर्ते की जेब से सौ के दो नोट निकालकर रत्नेश जी के सामने काउंटर पर रख दिया।
काउंटर पर से रुपए उठाते हुए रत्नेश जी ने जिज्ञासावश उस बुजुर्ग से पूछ लिया..
"आप यहीं कहीं आस-पास ही रहते हैं क्या अंकल?"
"नहीं बेटा!.मेरा घर यहां से काफी दूर है।"
"फिर भोजन करने आप अक्सर यहां कैसे आ पाते हैं?"
"मैं यहां एक दुकान में मुंशी का काम करता हूंँ!,.और जिस दिन रोटी खाने दोपहर में अपने घर नहीं जा पाता यहां आपके रेस्त्रां में आ जाता हूंँ!.हर रोज जेब में रुपए नहीं होते इसलिए उधार लगा जाता हूंँ,. लेकिन आज तनख्वाह मिली है तो जानबूझकर आ गया।" अपनी बात पूरी करता वह बुजुर्ग मुस्कुराया।
उस बुजुर्ग की उम्र देखते हुए रत्नेश जी खुद को रोक नहीं पाए एक और सवाल पूछ बैठे..
"घर में आपके बच्चे तो होंगे ना?"
"है ना!. बेटा-बहू सब हैं,. फिर भी हाथ-पांव सलामत होते हुए मुफ्त की रोटी खाना अच्छा नहीं लगता लेकिन पहले की तरह मेहनत का काम नहीं कर पाता इसलिए यहां मुंशी के काम पर लग गया हूंँ।"
बुजुर्ग की इमानदारी और कर्मनिष्ठा से प्रभावित रत्नेश जी का मन हुआ कि भोजन के वह रुपए उस बुजुर्ग को वापस कर दें लेकिन कहीं बुजुर्ग के आत्मसम्मान को ठेस ना पहुंचे यह सोच कर रत्नेश जी ने एक सौ अस्सी रुपए का भुगतान लेकर उस बुजुर्ग को बीस रुपए का एक नोट वापस करना चाहा।
लेकिन रेस्तरां में इधर-उधर नजर दौड़ाते हुए उस बुजुर्ग ने वह बीस रुपए का नोट यह कहते हुए लेने से इनकार कर दिया कि,..
"यह बीस रुपए उस कर्मचारी को टिप्स के तौर पर दे दीजिएगा जिसने मुझे हर बार बड़े स्नेह के साथ भोजन परोसा है।"
वह बुजुर्ग वहां से चलने को हुए लेकिन अपने कर्मचारी का उस बुजुर्ग के प्रति नजरिया और उस बुजुर्ग का उस कर्मचारी द्वारा परोसे गए भोजन के प्रति कृतज्ञता देख रत्नेश जी बीस रुपए का नोट अपने हाथ में थामें नि:शब्द हो गए।

Friday, 24 September 2021

हाँ, भगवान है...



 एक मेजर के नेतृत्व में 15 जवानों की एक टुकड़ी हिमालय के अपने रास्ते पर थी

  बेतहाशा ठण्ड में मेजर ने सोचा की अगर उन्हें यहाँ एक कप चाय मिल जाती तो आगे बढ़ने की ताकत आ जाती

 लेकिन रात का समय था आस पास कोई बस्ती भी नहीं थी
 लगभग एक घंटे की चढ़ाई के पश्चात् उन्हें एक जर्जर चाय की दुकान दिखाई दी

लेकिन अफ़सोस उस पर ताला लगा था

भूख और थकान की तीव्रता के चलते जवानों के आग्रह पर मेजर साहब दुकान का ताला तुड़वाने को राज़ी हो गये

 ताला तोडा गया, तो अंदर उन्हें चाय बनाने का सभी सामान मिल गया

  जवानों ने चाय बनाई साथ वहां रखे बिस्किट आदि खाकर खुद को राहत दी  थकान से उबरने के पश्चात् सभी आगे बढ़ने की तैयारी करने लगे लेकिन मेजर साहब को यूँ चोरो की तरह दुकान का ताला तोड़ने के कारण आत्मग्लानि हो रही थी

उन्होंने अपने पर्स में से एक हज़ार का नोट निकाला और चीनी के डब्बे के नीचे दबाकर रख दिया तथा दुकान का शटर ठीक से बंद करवाकर आगे बढ़ गए

 तीन महीने की समाप्ति पर इस टुकड़ी के सभी 15 जवान सकुशल अपने मेजर के नेतृत्व में उसी रास्ते से वापिस आ रहे थे

रास्ते में उसी चाय की दुकान को खुला देखकर वहां विश्राम करने के लिए रुक गए

उस दुकान का "मालिक एक बूढ़ा चाय वाला था"  जो एक साथ इतने ग्राहक देखकर खुश हो गया और उनके लिए चाय बनाने लगा

चाय की चुस्कियों और बिस्कुटों के बीच वो बुजुर्ग चाय वाले से उसके जीवन के  अनुभव पूछने लगे खास्तौर पर
 इतने बीहड़ में दूकान चलाने के बारे में 

 बुजुर्ग व्यक्ति उन्हें कईं कहानियां सुनाता रहा और साथ ही भगवान का आभार प्रकट करता रहा

 तभी एक जवान बोला " बाबा आप भगवान को इतना मानते हो अगर भगवान सच में होता तो फिर उसने तुम्हे इतने बुरे हाल में क्यों रखा हुआ है"

 बाबा बोला  "नहीं साहब ऐसा नहीं कहते भगवान के बारे में,
भगवान् तो है और सच में है .... मैंने देखा है"

 आखरी वाक्य सुनकर सभी जवान कोतुहल से बुजुर्ग की ओर देखने लगे

बाबा बोला "साहब मै बहुत मुसीबत में था एक दिन मेरे इकलौते बेटे को आतंकवादीयों ने पकड़ लिया उन्होंने उसे बहुत मारा पिटा लेकिन उसके पास कोई जानकारी नहीं थी इसलिए उन्होंने उसे मार पीट कर छोड़ दिया"

"मैं दुकान बंद करके उसे हॉस्पिटल ले गया मै बहुत तंगी में था साहब  और आतंकवादियों के डर से किसी ने उधार भी नहीं दिया"

"मेरे पास दवाइयों के पैसे भी नहीं थे और मुझे कोई उम्मीद भी नज़र नहीं आती थी उस रात साहब मै बहुत रोया और मैंने भगवान से प्रार्थना की और मदद मांगी "और साहब ...  उस रात भगवान मेरी दुकान में खुद आए"

"मै सुबह अपनी दुकान पर पहुंचा ताला टूटा देखकर मुझे लगा की मेरे पास जो कुछ भी थोड़ा बहुत था वो भी सब लुट गया"

" मै दुकान में घुसा तो देखा  1000 रूपए का एक नोट, चीनी के डब्बे के नीचे भगवान ने मेरे लिए रखा हुआ है"

"साहब ..... उस दिन एक हज़ार के नोट की कीमत मेरे लिए क्या थी शायद मै बयान न कर पाऊं ...
 लेकिन भगवान् है साहब ... भगवान् तो है"

  बुजुर्ग फिर अपने आप में बड़बड़ाया* 

 भगवान् के होने का आत्मविश्वास उसकी आँखों में साफ़ चमक रहा था

 यह सुनकर वहां सन्नाटा छा गया

 पंद्रह जोड़ी आंखे मेजर की तरफ देख रही थी जिसकी आंख में उन्हें अपने  लिए स्पष्ट आदेश था  "चुप  रहो "

 मेजर साहब उठे, चाय का बिल जमा किया और बूढ़े चाय वाले को गले लगाते हुए बोले "हाँ बाबा मै जानता हूँ भगवान् है.... और तुम्हारी चाय भी शानदार थी"

 और उस दिन उन पंद्रह जोड़ी आँखों ने पहली बार मेजर की आँखों में चमकते पानी के दुर्लभ दृश्य का साक्ष्य किया
  और
    सच्चाई यही है की भगवान तुम्हे कब किसी का भगवान बनाकर कहीं भेज दे ये खुद तुम भी नहीं जानते...........

Wednesday, 22 September 2021

call me

If one day you feel like crying…
call me
I don’t promise that
I will make you laugh

But I can cry with you.

If one day you want to run away
Don’t be afraid to call me.
I don’t promise to ask you to stop,

But I can run with you.

If one day you don’t want to listen to anyone
call me
i promise to be there for you
but i also promise to remain quiet

But…
If one day you call
and there is no answer…
come fast to see me..

Perhaps I need you.

Monday, 20 September 2021

समस्या

एक आदमी के घर में बिल बनाकर एक चूहा रहता था।

एक दिन उस चूहे ने देखा कि वह आदमी और उसकी पत्नी एक थैले से कुछ निकाल रहे हैं।

चूहे ने सोचा कि शायद कुछ खाने का सामान है।

उत्सुकतावश देखने पर उसने पाया कि वो एक चूहेदानी थी।

खतरा भाँपने के बाद उसने घर के ठीक पिछवाड़े में रह रहे एक कबूतर को यह बात बताई कि घर में चूहेदानी आ गई है जिससे सबको ख़तरा है।

कबूतर ने मजाक उड़ाते हुए कहा कि मुझे क्या ? मुझे कौन सा उसमें फँसना है ?

निराश चूहा ये बात नजदीक ही रह रहे एक मुर्गे को बताने गया।

मुर्गे ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा, जा भाई.. ये मेरी समस्या नहीं है...तुम जानो औऱ तुम्हारा काम ।

उसके बाद हताश चूहे ने एक बाड़े में जाकर बकरे को ये बात बताई तो बकरा हँसते-हँसते लोटपोट होने लगा।

सबसे बारी बारी से मिलकर औऱ उनकी बातें सुनकर चूहा बहुत निराश हो गया।

उसी रात चूहेदानी में अचानक खटाक की आवाज हुई, जिसमें एक जहरीला साँप फँस गया था।

अँधेरे में उसकी पूँछ को चूहा समझ कर उस व्यक्ति की पत्नी ने उसे निकालना चाहा तो साँप ने उसे डंस लिया।

पत्नी की तबीयत बिगड़ने पर उस व्यक्ति ने तुरंत हकीम को बुलवाया। 

हकीम ने देखकर उसे कबूतर का सूप पिलाने की सलाह दी।

झट से कबूतर को पकड़ लिया गया औऱ अब वह पतीले में उबल रहा था।

सांप काटने की खबर सुनकर उस व्यक्ति के कई रिश्तेदार उससे मिलने आ पहुँचे जिनके लिए अगले दिन भोजन प्रबंध हेतु उसी मुर्गे की बली दी गई ।

कुछ दिनों बाद उस व्यक्ति की पत्नी बिलकुल ठीक हो गयी, तो खुशी में उस व्यक्ति ने अपने शुभचिंतकों औऱ रिश्तेदारों के लिए एक दावत रखा जिसमें बकरे को काटा गया।

 'चूहा' अब दूर जा चुका था, बहुत दूर.....। 

सीख: -

■ अगली बार यदि कोई आपको अपनी समस्या बताये और आपको लगे कि ये मेरी समस्या नहीं है, तो रुकिए और दुबारा बहुत गंभीरता से सोचिये। अपने सीमित सोच के दायरे से बाहर निकलिये।

Friday, 17 September 2021

माँ की चप्पल

रात के 8 बजे का समय रहा होगा। एक लड़का एक जूतों की दुकान में आता है, गांव का रहने वाला था, पर तेज़ था।

उसका बोलने का लहज़ा गांव वालों की तरह का था, परन्तु बहुत ठहरा हुआ लग रहा था। उम्र लगभग 22 वर्ष का रहा होगा।

दुकानदार की पहली नज़र उसके पैरों पर ही जाती है। उसके पैरों में लेदर के शूज थे, सही से पाॅलिश किये हुये।

दुकानदार "क्या सेवा करूं?"

लड़का "मेरी माँ के लिये चप्पल चाहिये, किंतु टिकाऊ होनी चाहिये!"

दुकानदार "वे आई हैं क्या? उनके पैर का नाप?"

लड़के ने अपना बटुआ बाहर निकाला, चार बार फोल्ड किया हुआ एक कागज़ जिस पर पेन से आऊटलाईन बनाई हुई थी दोनों पैर की!

वह लड़का बोला "क्या नाप बताऊं साहब? मेरी माँ की ज़िन्दगी बीत गई, पैरों में कभी चप्पल नहीं पहनी। माँ मेरी मजदूर है,  मेहनत कर-करके मुझे पढ़ाया, पढ़ कर अब जाके नौकरी लगी।"

आज़ पहली तनख़्वाह मिली है। घर जा रहा हूं, तो सोचा माँ के लिए क्या ले जाऊँ? तो मन में आया कि अपनी पहली तनख़्वाह से माँ के लिये चप्पल लेकर आऊँ!

दुकानदार ने अच्छी टिकाऊ चप्पल दिखाई, जिसकी आठ सौ रुपये कीमत थी। 

"इतनी मंहगी चलेगी क्या?"

आगन्तुक लड़का उस कीमत के लिये तैयार था।

दुकानदार ने सहज ही पूछ लिया "कितनी तनख़्वाह है तेरी?"

"अभी तो बारह हजार, रहना-खाना मिलाकर सात-आठ हजार खर्च हो जाएंगे है यहाँ, और तीन हजार माँ के लिये" 

"अरे, फिर आठ सौ रूपये... कहीं ज्यादा तो नहीं।"

तो बात को बीच में ही काटते हुए लड़का बोला "नहीं, कुछ नहीं होता!"

दुकानदार ने चप्पल बाॅक्स पैक कर दिया। लड़के ने पैसे दिये और ख़ुशी-ख़ुशी दुकान से बाहर निकला।

पर दुकानदार ने उसे कहा "थोड़ा रुको!" 

साथ ही दुकानदार ने एक और बाॅक्स उस लड़के के हाथ में दिया

"यह चप्पल माँ को, तेरे इस भाई की ओर से गिफ्ट। माँ से कहना पहली ख़राब हो जायें तो दूसरी पहन लेना, नँगे पैर नहीं घूमना और इसे लेने से प्लीज मना मत करना!"

दुकानदार ने एकदम से दूसरी मांग करते हुए कहा "उन्हें मेरा प्रणाम कहना, और क्या मुझे एक चीज़ दोगे?"

"बोलिये।"

"वह पेपर, जिस पर तुमने पैरों की आऊटलाईन बनाई थी, वही पेपर मुझे चाहिये!"

वह कागज़, दुकानदार के हाथ में देकर वह लड़का ख़ुशी-ख़ुशी चला गया!

वह फोल्ड वाला कागज़ लेकर दुकानदार ने अपनी दुकान के पूजा घर में रख़ा!

दुकान के पूजाघर में कागज़ को रखते हुये दुकानदार के बच्चों ने देख लिया था और उन्होंने पूछ लिया कि "ये क्या है पापा?"

दुकानदार ने लम्बी साँस लेकर अपने बच्चों से बोला "लक्ष्मीजी के #पग लिये हैं बेटा! एक सच्चे भक्त ने उसे बनाया है, इससे धंधे में बरकत आती है!"

#मां तो इस संसार में साक्षात परमात्मा है! बस हमारी देखने की दृष्टि और मन श्रृद्धापूर्ण होना चाहिये।

सदैव प्रसन्न रहिये!!
जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!

Wednesday, 15 September 2021

फ्रीजर प्लांट

ये कहानी इक ऐसे व्यक्ति की है जो एक फ्रीजर प्लांट में काम करता था ।

वह दिन का अंतिम समय था व् सभी घर जाने को तैयार थे तभी प्लांट में एक तकनीकी समस्या उत्पन्न हो गयी और वह उसे दूर करने में जुट गया ।

जब तक वह कार्य पूरा करता तब तक अत्यधिक देर हो गयी ।
दरवाजे सील हो चुके थे व्
लाईटें बुझा दी गईं ।

*बिना हवा व् प्रकाश के पूरी रात आइस प्लांट में फसें रहने के कारण उसकी बर्फीली कब्रगाह बनना तय था ।*

घण्टे बीत गए तभी उसने
किसी को दरवाजा खोलते पाया ।...
क्या यह इक चमत्कार था ?
सिक्यूरिटी गार्ड टोर्च लिए खड़ा था व् उसने उसे बाहर निकलने में मदद की। वापस आते समय उस
व्यक्ति ने सेक्युर्टी गार्ड से पूछा "आपको कैसे पता चला कि मै भीतर हूँ ?"
गार्ड ने उत्तर दिया "
सर, इस प्लांट में 50 लोग कार्य करते हैँ पर सिर्फ एक आप हैँ
जो सुबह मुझे नमस्कार व् शाम को जाते समय फिर मिलेंगे कहते हैँ ।
आज सुबह आप ड्यूटी पर आये थे पर शाम को आप बाहर नही गए । इससे मुझे शंका हुई और
मैं देखने चला आया ।

व्यक्ति नही जानता था कि उसका किसी को छोटा सा सम्मान
देना कभी उसका जीवन बचाएगा 

याद रखेँ, जब भी आप किसी से मिलते हैं तो उसका गर्मजोश मुस्कुराहट के साथ सम्मान करें । 

हमें नहीं पता पर हो सकता है कि ये आपके जीवन में भी चमत्कार दिखा दे ।

जिन्दगी में दो चीजें कभी 

        मत कीजिए.....

झूठे आदमी के साथ प्रेम
            और 
    सच्चे आदमी के साथ 
            गेम

Sunday, 15 August 2021

झांसी की रानी / सुभद्राकुमारी चौहान




सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में।

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?
जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

खिलौने वाला / सुभद्रा कुमारी चौहान

वह देखो माँ आज
खिलौनेवाला फिर से आया है।
कई तरह के सुंदर-सुंदर
नए खिलौने लाया है।

हरा-हरा तोता पिंजड़े में
गेंद एक पैसे वाली
छोटी सी मोटर गाड़ी है
सर-सर-सर चलने वाली।

सीटी भी है कई तरह की
कई तरह के सुंदर खेल
चाभी भर देने से भक-भक
करती चलने वाली रेल।

गुड़िया भी है बहुत भली-सी
पहने कानों में बाली
छोटा-सा 'टी सेट' है
छोटे-छोटे हैं लोटा थाली।

छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं
हैं छोटी-छोटी तलवार
नए खिलौने ले लो भैया
ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार।

मुन्‍नू ने गुड़िया ले ली है
मोहन ने मोटर गाड़ी
मचल-मचल सरला करती है
माँ ने लेने को साड़ी

कभी खिलौनेवाला भी माँ
क्‍या साड़ी ले आता है।
साड़ी तो वह कपड़े वाला
कभी-कभी दे जाता है

अम्‍मा तुमने तो लाकर के
मुझे दे दिए पैसे चार
कौन खिलौने लेता हूँ मैं
तुम भी मन में करो विचार।

तुम सोचोगी मैं ले लूँगा।
तोता, बिल्‍ली, मोटर, रेल
पर माँ, यह मैं कभी न लूँगा
ये तो हैं बच्‍चों के खेल।

मैं तो तलवार खरीदूँगा माँ
या मैं लूँगा तीर-कमान
जंगल में जा, किसी ताड़का
को मारुँगा राम समान।

तपसी यज्ञ करेंगे, असुरों-
को मैं मार भगाऊँगा
यों ही कुछ दिन करते-करते
रामचंद्र मैं बन जाऊँगा।

यही रहूँगा कौशल्‍या मैं
तुमको यही बनाऊँगा।
तुम कह दोगी वन जाने को
हँसते-हँसते जाऊँगा।

पर माँ, बिना तुम्‍हारे वन में
मैं कैसे रह पाऊँगा।
दिन भर घूमूँगा जंगल में
लौट कहाँ पर आऊँगा।

किससे लूँगा पैसे, रूठूँगा
तो कौन मना लेगा
कौन प्‍यार से बिठा गोद में
मनचाही चींजे़ देगा।

Monday, 26 July 2021

गैर हाज़िर कन्धे


विश्वास साहब अपने आपको भागयशाली मानते थे। कारण यह था कि उनके दोनो पुत्र आई.आई.टी. करने के बाद लगभग एक करोड़ रुपये का वेतन अमेरिका में प्राप्त कर रहे थे। विश्वास साहब जब सेवा निवृत्त हुए तो उनकी इच्छा हुई कि उनका एक पुत्र भारत लौट आए और उनके साथ ही रहे; परन्तु अमेरिका जाने के बाद कोई पुत्र भारत आने को तैयार नहीं हुआ, उल्टे उन्होंने विश्वास साहब को अमेरिका आकर बसने की सलाह दी। विश्वास साहब अपनी पत्नी भावना के साथ अमेरिका गये; परन्तु उनका मन वहाँ पर बिल्कुल नहीं लगा और वे भारत लौट आए।

दुर्भाग्य से विश्वास साहब की पत्नी को लकवा हो गया और पत्नी पूर्णत: पति की सेवा पर निर्भर हो गई। प्रात: नित्यकर्म से लेकर खिलाने–पिलाने, दवाई देने आदि का सम्पूर्ण कार्य विश्वास साहब के भरोसे पर था। पत्नी की जुबान भी लकवे के कारण चली गई थी। विश्वास साहब पूर्ण निष्ठा और स्नेह से पति धर्म का निर्वहन कर रहे थे।

एक रात्रि विश्वास साहब ने दवाई वगैरह देकर भावना को सुलाया और स्वयं भी पास लगे हुए पलंग पर सोने चले गए। रात्रि के लगभग दो बजे हार्ट अटैक से विश्वास साहब की मौत हो गई। पत्नी प्रात: 6 बजे जब जागी तो इन्तजार करने लगी कि पति आकर नित्य कर्म से निवृत्त होने मे उसकी मदद करेंगे। इन्तजार करते करते पत्नी को किसी अनिष्ट की आशंका हुई। चूँकि पत्नी स्वयं चलने में असमर्थ थी, उसने अपने आपको पलंग से नीचे गिराया और फिर घसीटते हुए अपने पति के पलंग के पास पहुँची।

उसने पति को हिलाया–डुलाया पर कोई हलचल नहीं हुई। पत्नी समझ गई कि विश्वास साहब नहीं रहे। पत्नी की जुबान लकवे के कारण चली गई थी; अत: किसी को आवाज देकर बुलाना भी पत्नी के वश में नहीं था। घर पर और कोई सदस्य भी नहीं था। फोन बाहर ड्राइंग रूम मे लगा हुआ था। पत्नी ने पड़ोसी को सूचना देने के लिए घसीटते हुए फोन की तरफ बढ़ना शुरू किया। लगभग चार घण्टे की मशक्कत के बाद वह फोन तक पहुँची और उसने फोन के तार को खींचकर उसे नीचे गिराया। पड़ोसी के नंबर जैसे तैसे लगाये।

पड़ौसी भला इंसान था, फोन पर कोई बोल नहीं रहा था, पर फोन आया था, अत: वह समझ गया कि मामला गंभीर है। उसने आस– पड़ोस के लोगों को सूचना देकर इकट्ठा किया, दरवाजा तोड़कर सभी लोग घर में घुसे। उन्होने देखा -विश्वास साहब पलंग पर मृत पड़े थे तथा पत्नी भावना टेलीफोन के पास मृत पड़ी थी। पहले विश्वास और फिर भावना की मौत हुई। जनाजा दोनों का साथ–साथ निकला। 
पूरा मोहल्ला कंधा दे रहा था परन्तु दो कंधे मौजूद नहीं थे जिसकी माँ–बाप को उम्मीद थी। शायद वे कंधे करोड़ो रुपये की कमाई के भार से पहले ही दबे हुए थे।

Friday, 16 July 2021

विधि का विधान


श्री राम का विवाह और राज्याभिषेक, दोनों शुभ मुहूर्त देख कर किए गए थे; फिर भी न वैवाहिक जीवन सफल हुआ, न ही राज्याभिषेक

और जब मुनि वशिष्ठ से इसका उत्तर मांगा गया, तो उन्होंने साफ कह दिया 

"सुनहु भरत भावी प्रबल,
बिलखि कहेहूं मुनिनाथ।
हानि लाभ, जीवन मरण,
यश अपयश विधि हाथ।।"

अर्थात - जो विधि ने निर्धारित किया है, वही होकर रहेगा!

न राम के जीवन को बदला जा सका, न कृष्ण के!

न ही महादेव शिव जी सती की मृत्यु को टाल सके, जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आवाहन करता है!

न गुरु अर्जुन देव जी, और न ही गुरु तेग बहादुर साहब जी, और दश्मेश पिता गुरू गोबिन्द सिंह जी, अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे!

रामकृष्ण परमहंस भी अपने कैंसर को न टाल सके!

न रावण अपने जीवन को बदल पाया, न ही कंस, जबकि दोनों के पास समस्त शक्तियाँ थी!

एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु गरुड़ पर बैठ कर कैलाश पर्वत पर गए। द्वार पर गरुड़ को छोड़ कर श्री हरि खुद शिव से मिलने अंदर चले गए। तब कैलाश की प्राकृतिक शोभा को देख कर गरुड़ मंत्रमुग्ध थे कि तभी उनकी नजर एक खूबसूरत छोटी सी चिड़िया पर पड़ी। चिड़िया कुछ इतनी सुंदर थी कि गरुड़ के सारे विचार उसकी तरफ आकर्षित होने लगे।

उसी समय कैलाश पर यम देव पधारे और अंदर जाने से पहले उन्होंने उस छोटे से पक्षी को आश्चर्य की दृष्टि से देखा। गरुड़ समझ गए उस चिड़िया का अंत निकट है और यमदेव कैलाश से निकलते ही उसे अपने साथ यमलोक ले जाएँगे।

गरूड़ को दया आ गई। इतनी छोटी और सुंदर चिड़िया को मरता हुआ नहीं देख सकते थे। उसे अपने पंजों में दबाया और कैलाश से हजारो कोश दूर एक जंगल में एक चट्टान के ऊपर छोड़ दिया, और खुद वापिस कैलाश पर आ गया। आखिर जब यम बाहर आए तो गरुड़ ने पूछ ही लिया कि उन्होंने उस चिड़िया को इतनी आश्चर्य भरी नजर से क्यों देखा था। 

यम देव बोले "गरुड़ जब मैंने उस चिड़िया को देखा तो मुझे ज्ञात हुआ कि वो चिड़िया कुछ ही पल बाद यहाँ से हजारों कोस दूर एक नाग द्वारा खा ली जाएगी। मैं सोच रहा था कि वो इतनी जल्दी इतनी दूर कैसे जाएगी, पर अब जब वो यहाँ नहीं है तो निश्चित ही वो मर चुकी होगी।"

गरुड़ समझ गये "मृत्यु टाले नहीं टलती चाहे कितनी भी चतुराई की जाए।"
इस लिए श्री कृष्ण कहते है- करता तू वह है, जो तू चाहता है
परन्तु होता वह है, जो में चाहता हूँ
कर तू वह, जो में चाहता हूँ
फिर होगा वो, जो तू चाहेगा ।

मानव अपने जन्म के साथ ही जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश-स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है!

इसलिए सरल रहें, सहज, मन, वचन और कर्म से सद्कर्म में लीन रहें. 

Tuesday, 25 May 2021

चार कीमती रत्न 💎



1~ पहला रत्न है: "माफी"🙏
 
तुम्हारे लिए कोई कुछ भी कहे, तुम उसकी बात को कभी अपने मन में न बिठाना, और ना ही उसके लिए कभी प्रतिकार की भावना मन में रखना, बल्कि उसे माफ़ कर देना।

2~ दूसरा रत्न है: "भूल जाना"🙂

अपने द्वारा दूसरों के प्रति किये गए उपकार को भूल जाना, कभी भी उस किए गए उपकार का प्रतिलाभ मिलने की उम्मीद मन में न रखना।

3~ तीसरा रत्न है: "विश्वास"�

हमेशा अपनी महेनत और उस परमपिता परमात्मा पर अटूट विश्वास रखना। यही सफलता का सूत्र है।

4~ चौथा रत्न है: "वैराग्य"

हमेशा यह याद रखना कि जब हमारा जन्म हुआ है तो निश्चित ही हमें एक दिन मरना ही है। इसलिए बिना लिप्त हुवे जीवन का आनंद लेना। वर्तमान में जीना।💫

🌻💥💐🌻💥💐

Sunday, 23 May 2021

मैंने कोरोना को नही हराया


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-मैं एक प्रायवेट कम्पनी में बाबू
हूँ हमेंशा की तरह कम्पनी में  मैं काम कर रहा था ।मुझे हल्का बुखार आया शाम तक सर्दी भी हो गई ।पास ही के मेडिकल स्टोर से दवाइया बुला कर खाई 3-4 दिन थोडा ठीक रहा ।एक दिन अचानक साँस लेने मे दिक्कत हुई ओक्सिजन लेवल कम होने लगा। मेरी पत्नी ने तत्काल रिक्शा कर मुझे अस्पताल लेकर पहुंची ।सरकारी अस्पताल में पलंग फुल चल रहे थे, मैं देख रहा था मेरी पत्नी मेरे इलाज के लिये डाक्टर के सामने गिड़गिड़ा रही थी। अपने परिवार को असहाय सा बस देख ही पा रहा था। मेरी तकलीफ बढती जा रही थी ।मेरी पत्नी मुझे होसला दिला रही थी ।

कह रही थी,
 कुछ नही होगा हिम्मत रखो, 
 ( यह वही औरत थी जिसे मैं हमेशा कहता था की तुम बेवकूफ औरत हो तुम्हे क्या पता दुनिया मे क्या चल रहा हे)

 उसने   एक प्रायवेट अस्पताल में लड़ झगड कर मुझे भर्ती करवाया। फिर अपने भाई याने मेरे साले को फोन लगाकर सारी बातें बताई। उसकी उम्र होगी 20 साल करीबन जो मेरी नजर मे आवारा और निठल्ला था जिसे मेरे घर आने की परमीशन  नही थी। 

वह अक्सर मेरी गैर हाजरी  में ही मेरे घर आता जाता था।  अपने देवर को याने मेरे छोटे भाई को फोन लगा कर उसने बुलाया ।जो मेरे साले की उम्र का ही था जो बेरोजगार था और मे उसे कहता था। 

 काम का ना काज का दुश्मन अनाज का" दोनो घाबराते  हुए अस्पताल पहुंचे। दोनो की आंखो मे आंसू थे दोनो कह रहे थे की आप घबराना मत आपको हम कुछ नही होने देंगे ।डॉक्टर साहब कह रहे थे की हम 3-4 घन्टे ही आक्सीजन दे पायेंगे। फिर आपको ही आक्सीजन की सिलेंडर की व्यवस्था करनी होगी ।मेरी पत्नी बोली डाक्टर साहब ये सब हम कहा से लायेंगे ,तभी मेर भाई और साला बोले हम लायेंगे। सिलेंडर आप इलाज शुरु कीजिए। दोनों वहां  से रवाना हो गये मुझ पर बहोंशी छाने लगी और जब होश आया तो मेरे पास आक्सीजन सिलेंडर रखा था। 

 मेने पत्नी से पूछा ये कहा से आया उसने कहा तुम्हारा भाई और मेरा भाई दोनो लेकर आए हैं। मैंने पूछा कहां  से लाये ,उसने कहा ये तो वो ही जाने अचानक मेरा ध्यान पत्नी की खाली कलाइयों पर गया मैंने कहा तुम्हारे कंगन कहा गये? कितने साल से लड़ रही थी ।कंगन दिलवाओ कंगन दिलवाओ। 

अभी पिछ्ले महीने शादी की सालगिरह पर दिलवाये थे
 ( बोनस मिला था उससे) 

वह बोली आप चुपचाप सो जाइये कंगन यही हे कही नही गये। मुझे उसने दवाइयां दी। मैं  आराम करने लगा नींद आ गई ।जेसे ही नींद खुली क्या देखता हू मेरी पत्नी कई किलो वजनी सिलेंडर को उठा कर ले जा रही थी। जो थोडा सा भी वजनी सामान उठाना होता था। मुझे आवाज देती थी। 

आज केसे कई किलो वजनी सिलेंडर तीसरी मंजिल से नीचे ले जा रही थी और नीचे से भरा हुआ सिलेंडर उपर ला रही थी। मुझे गुस्सा आया मेरे साले और मेरे भाई पर ,ये दोनो कहा मर गये फिर सोचा आयेंगे। तब फटकारुंगा, फिर पडौस के बैड पर भी एक सज्जन भर्ती थे। उनसे बाते करने लगा मैंने कहा की अच्छा अस्पताल है। नीचे सिलेंडर आसानी से मिल रहे हैं।

 उन्होने कहा क्या खाक अच्छा अस्पताल है। यहां से 40 किलोमिटर दूर बड़े शहर मे 7-8 घन्टे लाइन में लगने के बाद बड़ी  मुश्किल से एक सिलेंडर मिल पा रहा है। 

आज ही अस्पताल में आक्सीजन  की कमी से 17 मौते हुई हैं। मैं सुनकर घबरा गया। मैं सोचने लगा की शायद मेरा साला और भाई भी एसे ही सिलेंडर ला रहे होंगे ।पहली बार दोनों  के प्रति सम्मान का भाव जागा था ।कुछ सोचता इससे पहले पत्नी बड़ा सा खाने का टिफ़िन लेकर आती दिखी। पास आकर बोली उठो खाना खा लो। उसने मुझे खाना दिया। एक कौर खाते ही मैने कहा ये तो माँ ने बनाया हे उसने कहा हां माँ ने ही बनाया हे। 

 माँ कब आई गाव से उसने कहा ।कल रात को अरे वो केसे आ गई ।अकेले तो वो कभी नही आई शहर ।पत्नी बोली बस से उतर कर आटो वाले को घर का पता जो एक पर्चे मे लिखा था। वह दिखा कर घर पहुंच गई ।मेरी माँ शायद बाबुजी के स्वर्गवास के बाद पहली बार ही अकेले सफर किया होगा। गांव की जमीन मां बेचने नही दे रही थी ।तो मेर माँ से मन मुटाव चल रहा था। कहती थी मेरे मरने के बात जैसा लगे वेसा करना ।जीते जी तो नहीं  बेचने दूंगी  पत्नी बोली। मुझे भी अभी मेरी मां ने बताया की आपकी माँ रात को आ गई थी। वो ही अपने घर से खाना लेकर आई है। आपकी माँ के हाथ का बना खाना। मैंने कहा पर तुम्हारी मां को तो पैरों  मे तकलीफ है। उन्हें चलते नही बनता हे। मेरे ससुर के स्वर्गवास के बाद बहुत कम ही घर से निकलती है। पत्नी बोली आप आराम से खाना खाइए। मैं खाना खाने लगा  कुछ देर बाद मेरे फटीचर दोस्तों  का फोन आया ।बोला हमारे लायक कोई काम हो तो बताना। मेने मन मे सोचा जो मुझसे उधार ले रखे हे 3000 वही वापस नही किया। काम क्या बताऊं  तुझे फिर भी मैंने मन में कहा ठीक हे जरुरत होगी। तो बाता दूंगा। मेने मुंह  बना कर फोन काट दिया ।

 16 दिंनों तक मेरी पत्नी सिलेंडर ढोती रही। मेरा भाई और साला लाईन में लगकर सिलेंडर लाते रहे फिर  हालत मे सुधार हुआ। फिर 18 वे दिन अस्पताल से छुट्टी हुई ।

 मुझे खुद पर गर्व था की मैंने कोरोना को हरा दिया । मैं फूला नहीं समा रहा था। 

घर पहुंच कर असली कहानी  पता चली कि, मेरे इलाज में बहुत सारा रुपया लगा है। कितना ये तो नही पता पर मेरी पत्नी के सारे जेवर जो उसने मुझ से लड़ -लड़ कर बनवाये थे बिक चुके थे ।         

  मेरे साले के गले की चेन बिक चुकी थी ।जो मेरी  पत्नी ने मुझसे साले की जनोई मे 15 दिन रूठ कर जबरजस्ती दिलवाई थी  ।

                  मेरा भाई जिस बाइक को अपनी जान से ज्यादा रखता था। वो भी घर मे दिखाई नही दे रही थी   ।                                      मेरी माँ जिस जमीन को जीतेजी नही बेचना चाहती थी। मेरे स्वर्गीय बाबूजी की आखरी निशानी थी वो भी मेरे इलाज मे बिक चुकी थी। 

                                   मेरी पत्नी से लड़ाई होने पर मे गुस्से मे कहता था की जाओ अपनी माँ के घर चली। जाओ वो मेर ससुराल का घर भी गिरवी रखा जा चुका था ।

      मेरे निठल्ले दोस्त ने जो मुझसे लिये 3000 रुपये ब्याज सहित वापस कर दिये थे ।
                 जिन्हें मैं  किसी काम का नही समझता था ।वे मेरे जीवन  को बचाने के लिये पूरे बिक चुके थे। मैं  अकेला रोये जा रहा था ।बाकी सब लोग खुश थे । क्योंकि  मुझे लग रहा था सब कुछ चला गया ,और उन्हें  लग रहा की मुझे बचा कर उन्होने सब कुछ बचा लिया ।

                               अब मुझे कोई भ्रम नहीं था की मेने कोरोना को हराया है। क्योंकि  कोरोना को तो मेरे अपनो ने परिवार ने हराया था सब कुछ बिकने के बाद भी मुझे लग रहा था की आज दुनिया में  मुझसे अमीर कोई नही हे।      

 धन्यवाद कोरोना l