"सर!.वह जो सबसे पीछे वाली मेज पर बुजुर्ग बैठे हैं ना,. वह वही है जो यहां पहले भी दो बार उधार खाना खाकर चले गए थे।"
उस रेस्त्रां के स्टाफ ने आकर धीरे से उस रेस्त्रां के मालिक रत्नेश जी के कान में यह बात बताया,.
"उनका आज का आर्डर कितने का है?"
रत्नेश जी ने अपने उस कर्मचारी से जानना चाहा।
"सर!.आर्डर तो वह कभी ज्यादा का नहीं करते हर बार की तरह आज भी साठ रुपए का ही ऑर्डर है,.तड़के वाली दाल के साथ दो रोटी।"
उस बुजुर्ग का साधारण सा भोजन का आर्डर सुनकर रत्नेश जी सोचने लगे..
"जरूर इनकी कोई मजबूरी रही होगी इसलिए पैसे नहीं चुका पाए होंगे।"
"नहीं सर!.ऐसे लोगों को मुफ्त की खाने की आदत होती है इसलिए पैसे नहीं चुकाते और ऐसे ही उधार रहा कह कर टालते रहते हैं।"
रेस्त्रां के उस कर्मचारी ने हिकारत भरी निगाहों से उस ओर देखा लेकिन रत्नेश जी ने अपने कर्मचारी की सोच को दरकिनार कर सबसे पिछली मेज पर बैठे उस बुजुर्ग को गौर से देखा..
"ठीक है!.तुम जाओ मैं देखता हूंँ।"
रत्नेश जी ने गौर किया कि साधारण वेशभूषा वाले उस बुजुर्ग के चेहरे पर उम्र की थकान साफ झलक रही थी। साधारण सा कुर्ता-पायजामा पहने अपने कंधे पर गमछा रखे वह बुजुर्ग किसी बहुत ही साधारण परिवेश में रचा-बसा मालूम पड़ रहा था।
खैर भोजन समाप्त कर वह बुजुर्ग सीधा रेस्त्रां के काउंटर पर रत्नेश जी के करीब आया..
"मेरा बिल कितने का हुआ?"
भोजन का वर्तमान और पिछले उधार के भुगतान की रसीद पहले से ही तैयार किए बैठे रत्नेश जी ने बिल आगे बढ़ा दिया,..
"एक सौ अस्सी रुपए!"
उस बुजुर्ग ने बिना कोई ना-नुकुर या टालमटोल किए अपने कुर्ते की जेब से सौ के दो नोट निकालकर रत्नेश जी के सामने काउंटर पर रख दिया।
काउंटर पर से रुपए उठाते हुए रत्नेश जी ने जिज्ञासावश उस बुजुर्ग से पूछ लिया..
"आप यहीं कहीं आस-पास ही रहते हैं क्या अंकल?"
"नहीं बेटा!.मेरा घर यहां से काफी दूर है।"
"फिर भोजन करने आप अक्सर यहां कैसे आ पाते हैं?"
"मैं यहां एक दुकान में मुंशी का काम करता हूंँ!,.और जिस दिन रोटी खाने दोपहर में अपने घर नहीं जा पाता यहां आपके रेस्त्रां में आ जाता हूंँ!.हर रोज जेब में रुपए नहीं होते इसलिए उधार लगा जाता हूंँ,. लेकिन आज तनख्वाह मिली है तो जानबूझकर आ गया।" अपनी बात पूरी करता वह बुजुर्ग मुस्कुराया।
उस बुजुर्ग की उम्र देखते हुए रत्नेश जी खुद को रोक नहीं पाए एक और सवाल पूछ बैठे..
"घर में आपके बच्चे तो होंगे ना?"
"है ना!. बेटा-बहू सब हैं,. फिर भी हाथ-पांव सलामत होते हुए मुफ्त की रोटी खाना अच्छा नहीं लगता लेकिन पहले की तरह मेहनत का काम नहीं कर पाता इसलिए यहां मुंशी के काम पर लग गया हूंँ।"
बुजुर्ग की इमानदारी और कर्मनिष्ठा से प्रभावित रत्नेश जी का मन हुआ कि भोजन के वह रुपए उस बुजुर्ग को वापस कर दें लेकिन कहीं बुजुर्ग के आत्मसम्मान को ठेस ना पहुंचे यह सोच कर रत्नेश जी ने एक सौ अस्सी रुपए का भुगतान लेकर उस बुजुर्ग को बीस रुपए का एक नोट वापस करना चाहा।
लेकिन रेस्तरां में इधर-उधर नजर दौड़ाते हुए उस बुजुर्ग ने वह बीस रुपए का नोट यह कहते हुए लेने से इनकार कर दिया कि,..
"यह बीस रुपए उस कर्मचारी को टिप्स के तौर पर दे दीजिएगा जिसने मुझे हर बार बड़े स्नेह के साथ भोजन परोसा है।"
वह बुजुर्ग वहां से चलने को हुए लेकिन अपने कर्मचारी का उस बुजुर्ग के प्रति नजरिया और उस बुजुर्ग का उस कर्मचारी द्वारा परोसे गए भोजन के प्रति कृतज्ञता देख रत्नेश जी बीस रुपए का नोट अपने हाथ में थामें नि:शब्द हो गए।
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