Thursday, 18 August 2016

बहू में भी एक बेटी का दिल है।

अरे उठो अरे उठो .....सुबह सुबह रक्षा के जोरदार चिलाने की आवाज सुनकर नींद से उठा वह कह रही थी पता है आज रक्षा बंधन का त्यौहार है और बूआजी व दीदी ना जाने किसी भी समय आ सकती है, और तुम सो रहे हो।अभी तो तुमको वृद्धाश्रम भी जाना है और वहा से बाबूजी को लेकर आना है,पत्नी की आवाज सुनकर जल्दी से उठ गया और कुछ ही देर में तैयार होकर वृद्धाश्रम की और चल पड़ा।रास्ते में न जाने कई ख्याल बादलों की तरह आ रहे और जा रहे थे बाबूजी कैसे होंगे उनका स्वास्थ्य कैसा होगा क्योकि उनसे मिले कई महीनें हो गए थे इसी उठा पटक में वृद्धाश्रम पहुच गया, वहा बाबूजी से मिला उनको प्रणाम किया और अपने साथ लेकर घर की और चल पड़ा रास्ते में बाबूजी से स्वास्थ्य के बारे में चर्चा कर रहा था बाबूजी बोले बेटा मै तो बहुत प्रसन्न हूँ और स्वास्थ भी अच्छा ही है, अब कितने दिन जीना है, पाँव कब्र में लटके हुए है ना जाने मौत कब आ जाएगी। ऐसे बातें करते हुए घर पहुच गए।घर पर बूआजी व दीदी भी आ गई थी, बाबूजी भी उनसे मिलकर बहुत प्रसन्न दिख रहे थे।हम सब ने मिलकर हंसी ख़ुशी से रक्षा बंधन का त्यौहार मनाया।समय अपनी गति से दौड़ा जा रहा था शाम होते होते बूआजी व दीदी अपने घर जाने लगे, उनको रोकना चाहा पर वो रुके नहीं उनके घर पर सास ससुर की सेवा करने वाला कोई नहीं था इसलिए वह समय पर अपने घर चले गए।मै रक्षा और बाबूजी रहे गए तभी रक्षा की आवाज आई बाबूजी को वृद्धाश्रम छोड़ने नहीं जाना है क्या???? बीबी की आवाज सुनकर नहीं चाहते हुए भी थके हुए कदमों की तरह कदम बढ़ाता हुआ बड़ी मुश्किल से चल पड़ा बाबूजी को वृद्धाश्रम छोड़ने का मेरा मन नहीं था पर क्या करता रक्षा की रोज रोज की चिकचिक से परेशान था।बाबूजी को लेकर वृद्धाश्रम पहुचा उनको वहा छोड़कर वापस चलने लगा आँखों में से आसु आ गए उनको छोड़ना नहीं चाहता था पर क्या करता मै मजबूर था??? जैसे ही रवाना हुआ पीछे से बाबूजी की आवाज आई बेटा तू रो मत अपने मन पर कोई बोझ मत रखना यह तो मेरा नसीब है तुझे पाने के लिए तेरी दीदी के बाद 3 कन्या भ्रूण की हत्या करवाई थी, उनके बाद तू अपनी माँ के कोख में आया था, उस समय मुझे पता नहीं था मै दुनियादारी के झुटे झांसे में आ गया और बेटे की चाहत में पागल हो गया था उसी पागलपन के कारण भ्रूण हत्या जैसा पाप कर बैठा जिसकी सजा भगवान मुझे दे रहे है, ऐसे कहते हुए बाबूजी की आँखें नम हो गए.......उन्होंने अपने आपको सम्भाला और मुझसे कहने लगे बेटा तेरे से एक विनती है मैंने जो गलती की है वो जीवन में तू कभी मत करना, बेटे के लिए कन्या भ्रूण की हत्या मत करवाना नहीं तो तुझे भी अपना बुढ़ापा वृद्धाश्रम में बिताना पडेगा......उनकी आवाज में एक दर्द छुपा हुआ था, उनसे विदा लेकर मै चल पड़ा, पुरे रास्ते उनकी आवाज मेरे कानों में गुज रही थी, घर आकर रक्षा को बाबूजी की बात सुनाई उसकी आँखों में भी आसूँ आने लग गए, थोड़ी देर हम दोनों चुपचाप बैठे रहे.....तभी रक्षा ने आदेश दिया गाडी निकालो हम अभी के अभी वृद्धाश्रम जाएंगे और वहा से बाबूजी को लेकर आएँगे, मेरे पैरो में मानो जैसे पंख लग गए, गाडी निकाल कर हम दोनों बाबूजी को लेने वृद्धाश्रम की और चल पड़े।
सज्जनों मेरा आपसे सादर निवेदन है बेटी आखिर बेटी ही होती है रक्षा भी किसी की बेटी थी बहु बनकर दूसरे के घर चली गई पर मन तो उसका कोमल ही था जिस कारण मन तो परिवर्तन होना ही था और हम बेटा बेटी के चक्कर में पड़कर जाने अनजाने में पाप कर बैठते है जिसका फल हमको भोगना ही पड़ता है।इसलिए आइये रक्षा बंधन के पवित्र त्यौहार पर रक्षा जैसी बेटी पर गर्व करते हुए संकल्प करें और "आठवाँ वचन" लेवें कि भ्रूण हत्या व बेटियों पर अत्याचार नहीं होने देंगे तभी हमारा रक्षा बंधन त्यौहार मनाना सार्थक होगा और यही सही मायनों में अपनी बहनों को दिया हुआ अनमोल उपहार होगा।

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