(जनवरी १९६९ में गायत्री तपोभूमि, मथुरा में दिया गया प्रवचन)
🔵 हिंदुस्तान में सोमवती अमावस्या के दिन गंगास्नान का बहुत महत्त्व है। कल्पना कीजिए कि हरिद्वार से लेकर गंगासागर तक स्नान करने वालों की संख्या कम- से कम हर सोमवती अमावस्या के दिन पचास लाख हो जाती है। एक आदमी के जाने- आने का, श्रम का, खाने- पीने का, दान- दक्षिणा आदि का खरच बीस रुपया आता हो और उसे पचास लाख से गुणा कर दिया जाए तो दस करोड़ रुपया प्रति सोमवती अमावस्या का खरच आता है। आप कल्पना कीजिए कि कम- से चार और ज्यादा से ज्यादा पाँच सोमवती अमावस्या हर वर्ष होती हैं। उनका खरचा लगा दिया जाए, तो पचास करोड़ रुपया खरच करने वालों से प्रार्थना की गई होती कि आप एक वर्ष स्नान करने की अपेक्षा गंगा का उपयोग, गंगा की महत्ता समाज में बनाए रखने के लिए विवेकपूर्वक विचार करें।
🔵 मित्रो! जिन शहरों की गंदी नालियाँ गंगा में डाली जाती हैं, वहाँ का पानी अपवित्र कर दिया जाता है। स्नान करने वाला उसी नाले के दूषित पानी मिले हुए गंगाजल को पीता है और उसी का आचमन करके चला जाता है। वह गंदा पानी यदि गंगा में डालने की अपेक्षा शहर की नालियों- ड्रेनेज के द्वारा शहर से बाहर निकाला गया होता और खेतों में, बगीचों में डाल दिया गया होता तो कितने एकड़ भूमि की सिंचाई हो जाती! गंगा में, यमुना में और दूसरी नदियों में जो गंदगी पैदा होती है, उनका पानी खराब होता है, जो कि स्नान करने और पीने के लायक भी नहीं रह जाता, बीमारियाँ और फैलाता है। वह पचास करोड़ रुपया यदि उस गंदे पानी का सदुपयोग करने और नदियों को साफ रखने में खरच किया गया होता, तो कैसा अच्छा होता, मजा आ जाता।
🔵 लेकिन क्या कहा जाए? इसे मैं धर्मभीरुता कहता हूँ, धर्मभावना नहीं कहता। अपने देश में सिर्फ धर्मभीरुता है, धर्मभावना नहीं है। धर्मभीरुता और धर्मभावना में जमीन- आसमान का फर्क है। गाँव- गाँव में रामचंद्र जी की लीलाएँ और श्रीकृष्ण की लीलाएँ होती हैं। एक- एक लीला में बीस- बीस तीस- तीस हजार रुपया खरच हो जाता है। केवल मनोरंजन, तमाशा होता है। लोग तालियाँ बजाते हैं, मेला- ठेला तमाशा देखते हैं और चले जाते हैं। मित्रो! वह धन, जो अवांछनीय और अनावश्यक खेल- प्रसंगों में खरच किया जाता है, जिसको जनता पुण्य समझती है, उसके द्वारा हमने एक क्रमबद्ध रूप से अभिनय मंच बनाया होता, ऐसी थियेटरिकल कंपनियाँ बनाई होतीं, जो गाँव- गाँव में जाकर भगवान् राम और श्रीकृष्ण भगवान् के जीवन के उद्देश्यों का शिक्षण देने में समर्थ रही होतीं। उनके नाटक, प्रहसनों ने जनता के मन- मस्तिष्क को और जनता की दिशाओं को बदल दिया होता। जिससे उनमें नैतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना उत्पन्न की जा सकती थी पर हम देखते हैं कि तमाशे के, उपहास के, मजाक के रूप में भगवान् को एक खिलौना बना देते हैं। भगवान् का सम्मान करने की बात न जाने कहाँ चली जाती है।
🌹 क्रमशः जारी 🌹
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 🌹
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Lectures/5.2
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